UP Board Class 9 Social Science Civics | संविधान निर्माण

By | April 11, 2021

UP Board Class 9 Social Science Civics | संविधान निर्माण

UP Board Solutions for Class 9 Social Science Civics Chapter 2 संविधान निर्माण

अध्याय 2.                          संविधान निर्माण
                                               अभ्यास
NCERT प्रश्न
प्रश्न 1. नीचे कुछ गलत वाक्य दिए गए हैं। हर एक में की गई गलती पहचानें और इस
           अध्याय के आधार पर उसको ठीक करके लिखें―
(क) स्वतन्त्रता के बाद देश लोकतान्त्रिक हो या नहीं, इस विषय पर स्वतन्त्रता आन्दोलन
       के नेताओं ने अपना दिमाग खुला रखा था।
(ख) भारतीय संविधान सभा के सभी सदस्य संविधान में कही गई हरेक बात पर सहमत थे।
(ग) जिन देशों में संविधान है वहाँ लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था ही होगी।
(घ) संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है इसलिए इसमें बदलाव नहीं किया जा
सकता।
उत्तर―(क) यह वाक्य गलत है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के नेता इस बात पर स्पष्ट थे कि स्वतन्त्रता
के बाद देश लोकतान्त्रिक होगा।
भी गलत वाक्य है। भारतीय संविधान सभा के सभी सदस्य संविधान में कही हर
एक बात पर सहमत नहीं थे। उनमें कई बातों पर भेद थे परन्तु आपसी विचार-विमर्श
के बाद उनमें सहमति हो जाती रही है।
(ग) यह वाक्य/कथन गलत है।
(घ) यह वाक्य/कथन गलत है। संसद दो-तिहाई के बहुमत से संविधान की किसी धारा में
भी संशोधन कर सकती है।
 
प्रश्न 2. दक्षिण अफ्रीका का लोकतान्त्रिक संविधान बनाने में, इनमें से कौन-सा टकराव
सबसे महत्त्वपूर्ण था?
(क) दक्षिण अफ्रीका और उसके पड़ोसी देशों का
(ख) स्त्रियों और पुरुषों का
(ग) गोरे अल्पसंख्यक और अश्वेत बहुसंख्यकों का
(घ) रंगीन चमड़ी वाले बहुसंख्यकों और अश्वेत अल्पसंख्यकों का
                उत्तर― (घ) रंगीन चमड़ी वाले बहुसंख्यकों और अश्वेत अल्पसंख्यकों का
 
प्रश्न 3. लोकतान्त्रिक संविधान में इनमें से कौन-सा प्रावधान नहीं रहता?
(क) शासन प्रमुख के अधिकार
(ख) शासन प्रमुख का नाम
(ग) विधायिका के अधिकार
(घ) देश का नाम
                      उत्तर― (ख) शासन प्रमुख का नाम
 
प्रश्न 4. संविधान निर्माण में इन नेताओं और उनकी भूमिका में मेल बैठाएँ :
(क) मोतीलाल नेहरू                            1. संविधान सभा के अध्यक्ष
(ख) बी०आर० अंबेडकर                      2. संविधान सभा की सदस्य
(ग) राजेन्द्र प्रसाद                                3. प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष
(घ) सरोजिनी नायडू                            4. 1928 में भारत का संविधान बनाया
उत्तर― सही मेल इस प्रकार हैं―
(क) मोतीलाल नेहरू                        4. 1928 में भारत का संविधान बनाया
(ख) बी०आर० अंबेडकर                   3. प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष
(ग) राजेन्द्र प्रसाद                            1. संविधान सभा के अध्यक्ष
(घ) सरोजिनी नायडू                         2. संविधान सभा की सदस्य
 
प्रश्न 5. जवाहरलाल नेहरू के नियति के साथ साक्षात्कार वाले भाषण के आधार पर
निम्नलिखित प्रश्नों का जवाब दें―
(क) नेहरू ने क्यों कहा कि भारत का भविष्य सुस्ताने और आराम करने का नहीं है?
(ख) नए भारत के सपने किस तरह विश्व से जुड़े हैं?
(ग) वे संविधान निर्माताओं से क्या शपथ चाहते थे?
(घ) “हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की कामना हर आँख से आँसू पोंछने की है।” वे
इस कथन में किसका जिक्र कर रहे थे?
उत्तर―(क) नेहरू ने कहा कि भारत का भविष्य सुस्ताने और आराम करने का नहीं क्योंकि उन
वायदों को पूरा करना है जो लोगों से किए गए हैं।
(ख) नेहरू के अनुसार भारत के साथ-साथ मानवता की सेवा करना अधिक उचित होगा।
(ग) वे चाहते थे कि संविधान निर्माता यह शपथ लें कि वे दुःख और परेशानियों में पड़े.
लाखों-करोड़ों लोगों की सेवा करेंगे और दरिद्रता, अज्ञान, बीमारियों और अवसर की
असमानता का अन्त करेंगे।
(घ) वे इस कथन में महात्मा गांधी का जिक्र कर रहे थे।
 
प्रश्न 6. हमारे संविधान को दिशा देने वाले ये कुछ मूल्य और उनके अर्थ हैं। इन्हें आपस में
मिलाकर दोबारा लिखिए―
(क) संप्रभु           1. सरकार किसी धर्म के निर्देशों के अनुसार काम नहीं करेगी।
(ख) गणतन्त्र        2. फैसले लेने का सर्वोच्च अधिकार लोगों के पास है।
(ग) बंधुत्व            3. शासन प्रमुख एक चुना हुआ व्यक्ति है।
(घ) धर्मनिरपेक्ष     4. लोगों को आपस में परिवार की तरह रहना चाहिए।
उत्तर―
(क) सार्वभौम (संप्रभु)     2. फैसले लेने का सर्वोच्च अधिकार लोगों के पास है।
(ख) गणतन्त्र                 3. शासन प्रमुख एक चुना हुआ व्यक्ति है।
(ग) बंधुत्व                     4. लोगों को आपस में परिवार की तरह रहना चाहिए।
(घ) धर्मनिरपेक्ष              1. सरकार किसी धर्म के निर्देशों के अनुसार काम नहीं करेगी।
 
प्रश्न 7. कुछ दिन पहले नेपाल से आपके एक मित्र ने वहाँ की राजनैतिक स्थिति के बारे में
आपको पत्र लिखा था। वहाँ अनेक राजनैतिक पार्टियाँ राजा के शासन का विरोध
कर रही थीं। उनमें से कुछ का कहना था कि राजा द्वारा दिए गए मौजूदा संविधान
में ही संशोधन करके चुने हुए प्रतिनिधियों को ज्यादा अधिकार दिए जा सकते हैं।
अन्य पार्टियाँ नया गणतान्त्रिक संविधान बनाने के लिए नई संविधान सभा गठित
करने की माँग कर रही थी। इस विषय में अपनी राय बताते हुए अपने मित्र को पत्र
लिखें।
उत्तर― निम्नलिखित बिन्दुओं से सहायता लेते हुए अपना उत्तर लिखें―
निर्वाचित प्रतिनिधियों को और अधिक शक्तियाँ देने के लिए संविधान में संशोधन की माँग,
गणतंत्रात्मक संविधान लिखने के लिए एक नई संविधान सभा और राजा के शासन का विरोध यह
दर्शाते हैं कि लोग लोकतंत्र के पक्ष में हैं और राजतंत्रात्मक शासन को अपने देश से उखाड़ फेंकना
चाहते हैं।
 
प्रश्न 8. भारत के लोकतन्त्र के स्वरूप में विकास के प्रमुख कारणों के बारे में कुछ
अलग―अलग विचार इस प्रकार हैं। आप इनमें से हर कथन को भारत में
लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए कितना महत्त्वपूर्ण कारण मानते हैं?
(क) अंग्रेज शासकों ने भारत को उपहार के रूप में लोकतान्त्रिक व्यवस्था दी। हमने ब्रिटिश
हुकूमत के समय बनी प्रान्तीय असेंबलियों के जरिए लोकतान्त्रिक व्यवस्था में काम
करने का प्रशिक्षण पाया।
(ख) हमारे स्वतन्त्रता संग्राम ने औपनिवेशिक शोषण और भारतीय लोगों को तरह-तरह की
आजादी न दिए जाने का विरोध किया। ऐसे में स्वतन्त्र भारत को लोकतान्त्रिक होना
ही था।
(ग) हमारे राष्ट्रवादी नेताओं की आस्था लोकतन्त्र में थी। अनेक नव स्वतन्त्र राष्ट्रों में
लोकतन्त्र का न आना हमारे नेताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।
उत्तर―(क) इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमने ब्रिटिश हुकूमत के समय बनी प्रान्तीय एसेंबलियों के
जरिए लोकतान्त्रिक व्यवस्था में काम करने का प्रशिक्षण पाया परन्तु यह अंग्रेज
शासकों का भारत को कोई उपहार नहीं, इसके लिए उनको बहुत संघर्ष करना पड़ा।
(ख) दूसरा विचार भारत में लोकतान्त्रिक व्यवस्था लाने का महत्त्वपूर्ण कारण है, भारत के सभी
लोगों ने स्वतन्त्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया था और इकट्ठे मिलकर ब्रिटिश
साम्राज्यवाद का मुकाबला किया था, इसलिए भारत में लोकतान्त्रिक व्यवस्था लाना
आवश्यक बन गया था।
(ग) हमारे राष्ट्रवादी नेताओं की आस्था लोकतन्त्र में थी इसलिए स्वतन्त्रता के पश्चात्
लोकतान्त्रिक व्यवस्था को लाया जाना स्वाभाविक ही था।
 
प्रश्न 9. 1912 में प्रकाशित विवाहित महिलाओं के लिए आचरण पुस्तक के निम्नलिखित
अंश को पढ़ें―
“ईश्वर ने औरत जाति को शारीरिक और भावनात्मक, दोनों ही तरह से ज्यादा
नाजुक बनाया है। उन्हें आत्मरक्षा के भी योग्य नहीं बनाया है। इसलिए ईश्वर ने ही
उन्हें जीवन भर पुरुषों के संरक्षण में रहने का भाग्य दिया है-कभी पिता के, कभी
पति के और कभी पुत्र के। इसलिए महिलाओं को निराश होने की जगह इस बात से
अनुगृहीत होना चाहिए कि वे अपने आपको पुरुषों की सेवा में समर्पित कर सकती
हैं।” क्या इस अनुच्छेद में व्यक्त मूल्य संविधान के दर्शन से मेल खाते हैं या वे
संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं?
उत्तर― प्रश्न में उल्लिखित अनुच्छेद में व्यक्त मूल्य संविधान के मूल्यों से मेल नहीं खाते बल्कि वे
संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं। भारतीय संविधान ने बिना किसी लिंग के भेदभाव के महिलाओं को
पुरुषों के बराबर ही अधिकार दे रखे हैं। स्त्री और पुरुष में कोई भेदभाव रखना भारतीय संविधान के
समानता के अधिकार के बिलकुल विरुद्ध जाता है।
 
प्रश्न 10.निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए। क्या आप उनसे सहमत हैं? अपने कारण
भी बताइए―
(क) संविधान के नियमों की हैसियत किसी भी अन्य कानून के बराबर है।
(ख) संविधान बताता है कि शासन व्यवस्था के विविध अंगों का गठन किस तरह होगा?
(ग) नागरिकों के अधिकार और सरकार की सत्ता की सीमाओं का उल्लेख भी संविधान में
स्पष्ट रूप में है।
(घ) संविधान संस्थाओं की चर्चा करता है, उसका मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है।
उत्तर―(क) संविधान के नियमों की हैसियत किसी भी अन्य कानून के बराबर है, इस विचार से हम
सहमत नहीं हैं। संविधान के नियम साधारण कानूनों की अपेक्षा बहुत अधिक महत्त्व
रखते हैं, कोई भी मतभेद हो जाने पर संविधान का नियम ही मान्य होगा, दूसरा नहीं।
 
(ख) प्रश्न में उल्लिखित कथन उपयुक्त है क्योंकि संविधान बताता है कि शासन-व्यवस्था के
विविध अंगों का गठन किस तरह होगा।
 
(ग) प्रश्न में उल्लिखित कथन सत्य है क्योंकि हमारे संविधान में नागरिकों के अधिकार और
सरकार की सत्ता की सीमाओं का उल्लेख भी संविधान में स्पष्ट रूप में है।
 
(घ) प्रश्न में उल्लिखित कथन गलत है क्योंकि संविधान जितना संख्याओं से सम्बन्धित है उतना
बल्कि उससे भी अधिक वह मूल्यों से सम्बन्धित है।
 
                                    अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
 
                                       बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. नेल्सन मंडेला को आजीवन कारावास की सजा कब दी गई?
(क) 1961 
(ख) 1962 
(ग) 1963 
(घ) 1964
                उत्तर―(घ) 1964
 
प्रश्न 2. कब से अश्वेत, रंगीन चमड़ी वाले और भारतीय मूल के लोगों ने रंगभेद प्रणाली के
खिलाफ संघर्ष किया?
(क) 1947
(ख) 1948 
(ग) 1949 
(घ) 1950
              उत्तर―(घ) 1950
 
प्रश्न 3. नेल्सन मंडेला कितने वर्ष जेल में रहे?
(क) 25 वर्ष
(ख) 26 वर्ष
(ग) 27 वर्ष
(घ) 28 वर्ष
              उत्तर―(ग) 27 वर्ष
 
प्रश्न 4. प्रारूप कमेटी के सदस्य टी०टी० कृष्णामचारी किस राज्य से है?
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) महाराष्ट्र 
(ग) तमिलनाडु
(घ) केरल
             उत्तर―(ग) तमिलनाडु
 
प्रश्न 5. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कितनी बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
            उत्तर―(ख) तीन
 
प्रश्न 6. संविधान पर लगभग तीन वर्षों में कितने दिन गम्भीर चर्चा हुई?
(क) 111 
(ख) 112 
(ग) 113
(घ) 114
             उत्तर―(घ) 114
 
प्रश्न 7. यंग इण्डिया के सम्पादक कौन थे?
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) मदन मोहन मालवीय
(ग) गांधीजी
(घ) सरदार पटेल
                        उत्तर―(ग) गांधीजी
 
प्रश्न 8. सोमनाथ लाहिड़ी किस पार्टी से सम्बद्ध थे?
(क) भारत की मार्क्सवादी पार्टी 
(ख) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
(ग) कांग्रेस पार्टी
(घ) प्रजा पार्टी
                   उत्तर―(ख) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
 
प्रश्न 9. अबुल कलाम जो राष्ट्रवादी मुसलमान थे, इनका जन्म कहाँ हुआ था?
(क) भारत 
(ख) सऊदी अरब 
(ग) इराक 
(घ) कुवैत
             उत्तर―(ख) सऊदी अरब
 
प्रश्न 10. भारतीय जनसंघ के संस्थापक कौन थे?
(क) अटल बिहारी बाजपेयी
(ख) श्यामाचरण शुक्ल
(ग) लालकृष्ण आडवानी
(घ) बलराज मधोक
                            उत्तर―(ख) श्यामाचरण शुक्ल
 
                                अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. किस पर अफ्रीका की गोरी सरकार ने देशद्रोह का मुकदमा चलाया?
            उत्तर― नेल्सन मंडेला पर।
 
प्रश्न 2. कहाँ काले लोग गोरों के लिए आरक्षित जगह तो क्या उनके गिरिजाघर तक में नहीं
जा सकते थे?
               उत्तर―दक्षिण अफ्रीका में।
 
प्रश्न 3. कब दक्षिण अफ्रीका में गणराज्य का नया झण्डा लहराया?
           उत्तर― 26 अप्रैल, 1994 की मध्यरात्रि को।
 
प्रश्न 4. दक्षिण अफ्रीका के संविधान निर्माण में लगभग कितना समय लगा?
            उत्तर― 1 वर्ष, 10 माह, 28 दिन।
 
प्रश्न 5. हमें संविधान से क्या अपेक्षा होती है?
          उत्तर― हमें संविधान से अपेक्षा होती है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय होने की हैसियत से यह
नागरिकों के अधिकार, सरकार की शक्ति और उसके कामकाज के तौर-तरीकों का उचित तरीके से
निर्धारण करे।
 
प्रश्न 6. कवयित्री, लेखिका और राजनैतिक कार्यकर्ता जो आंध्र प्रदेश से सम्बद्ध थी, कौन
थी?
उत्तर― सरोजनी नायडू।
 
प्रश्न 7. संविधान सभा में किस समूह, जाति, धर्म और पेशे के लोग थे?
उत्तर― संविधान सभा में सभी जातियों, धर्मों और समूह के लोग थे। इनमें दलित, पिछड़े,
अल्पसंख्यक जनजातीय सभी का प्रतिनिधित्व था। इनमें वकील, व्यापारी, लेखक तथा नेता इत्यादि पेशों
से संबद्ध लोग थे।
 
प्रश्न 8. संविधान लगभग कितने समय में बनकर तैयार हुआ?
उत्तर― 2 वर्ष, 11 महीने, 18 दिन।
 
प्रश्न 9. न्याय से क्या अभिप्राय है?
उत्तर― न्याय से अभिप्राय है-नागरिकों के साथ उनकी जाति, धर्म एवं लिंग के आधार पर भेदभाव
नहीं करना।
 
प्रश्न10. आप समता से क्या समझते हो?
उत्तर― कानून के समक्ष सभी समान हैं तथा सरकार को सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित
करने चाहिए।
 
                              लघु उत्तरीय प्रश्न
 
प्रश्न 1.डॉ० अम्बेडकर के संविधान निर्माण के पश्चात दिये गये वक्तव्य पर प्रकाश
डालिए।
उत्तर― डॉ. अम्बेडकर के संविधान निर्माण के पश्चात् दिया गया वक्तव्य निम्नवत है-
“26 जनवरी, 1950 को हम विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति के मामले में
हमारे यहाँ समानता होगी, पर आर्थिक एवं सामाजिक जीवन असमानताओं से भरा होगा। राजनीति में
हम एक व्यक्ति-एक वोट और ‘हर वोट का समान महत्त्व’ के सिद्धान्त को मानेंगे। अपने सामाजिक
एवं आर्थिक जीवन में हम अपने सामाजिक एवं आर्थिक ढाँचे के कारण ही, एक व्यक्ति-एक वोट’
के सिद्धान्त को नकारना जारी रखेंगे। हम इस विरोधाभासपूर्ण जीवन को कितने लम्बे समय तक जीते
रहेंगे? हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में कब तक समानता को नकारते रहेंगे? अगर यह
नकारना अधिक लम्बे समय तक चला तो हम अपने राजनैतिक लोकतन्त्र को ही संकट में डालेंगे।”
 
प्रश्न 2. 15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि के समय संविधान सभा में नेहरू जी के दिये गये
भाषण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर― 15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि के समय संविधान सभा में नेहरू जी द्वारा दिया गया
भाषण निम्नवत् है―
“वर्षों पहले हमने अपनी नियति के साथ साक्षात्कार किया था एवं अब वक्त आ गया है कि हम अपने
वायदों पर अमल करें-पूरी तरह या हर तरह से नहीं तो काफी हद तक। घड़ियाँ जब ठीक मध्य रात्रि
का घंटा बजाएँगी, जब सारी दुनिया सोती होगी, तब भारत नए जीवन का प्रारम्भ करेगा, आजाद होगा।
इतिहास में कभी-कभार ही सही पर एक ऐसा क्षण अवश्य आता है, जब हम पुराने को छोड़कर नए में
प्रवेश करते हैं, जब एक युग का अन्त होता है एवं जब लम्बे समय से किसी राष्ट्र की दबी हुई आत्मा
प्रस्फुटित होती है, आवाज पाती है। ऐसे पवित्र क्षण में हम अपने आपको, भारत एवं उसके लोगों और
उससे भी अधिक मानवता की सेवा में समर्पित करें, यही हमारे लिए सही है।
आजादी एवं सत्ता जिम्मेवारियाँ लाती हैं। भारत के सम्प्रभु लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस
सम्प्रभुता सम्पन्न सभा के ऊपर अब जिम्मेवारी है। आजादी के जन्म से पूर्व हमने पूरी प्रसव पीड़ा झेली
है और इस क्रम में हुए दुःखों से हमारा दिल भारी है। इसमें कुछ दर्द अभी भी बने हुए हैं। फिर भी,
इतिहास अब बीत चुका है और अब भविष्य हमें सुनहरे संकेत दे रहा है।
 
यह भविष्य बहुत आराम करने या सुस्ताने का नहीं वरन् उन वायदों को पूरा करने के लिए निरन्तर
प्रयास करने का है जिन्हें हमने अकसर किया है और एक शपथ हम आज भी लेंगे। भारत की सेवा
करने का अर्थ है, दुःख एवं परेशानियों में पड़े लाखों-करोड़ों लोगों की सेवा करना। इसका अर्थ है
दरिद्रता का, अज्ञान तथा बीमारियों का, अवसर की असमानता का अन्त। हमारे युग के महानतम
आदमी की कामना हर आँख से आँसू पोंछने की है। सम्भव है यह काम हमारे भर से पूरा न हो पर जब
तक लोगों की आँखों में आँसू हैं, कष्ट है तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा।”
 
प्रश्न 3. संविधान की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर― प्रत्येक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए एक लिखित संविधान आवश्यक है। संविधान
के लिखित होने से विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हेतु नियम और कानून निर्दिष्ट होते हैं
जिनसे सरकार सरलता से चलती है। संविधान की आवश्यकता के कुछ प्रमुख कारण निम्नवत् हैं―
(i) लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए संविधान का होना अनिवार्य है।
(ii) संविधान सरकार की शक्ति तथा सत्ता का स्रोत है।
(iii) संविधान सरकार के ढाँचे तथा सरकार के विभिन्न अंगों की शक्तियों की व्यवस्था करता है।
(iv) संविधान सरकार के विभिन्न अंगों के पारस्परिक संबंध निर्धारित करता है।
(v) संविधान सरकार और नागरिकों के संबंधों को निर्धारित करता है।
(vi) संविधान सरकार की शक्तियों पर सीमाएँ लगाता है।
(vii) संविधान सर्वोच्च कानून है जिनके द्वारा समाज के विभिन्न लोगों में समन्वय किया जाता है।
 
प्रश्न 4. संविधान सभा के समक्ष क्या चुनौतियाँ थीं?
उत्तर― संविधान सभा के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख चुनौतियाँ थीं―
भारत को एकता के सूत्र में बाँधने की चुनौती―संविधान के समक्ष पहली महत्त्वपूर्ण चुनौती भारत
को एकता के सूत्र में बाँधने की थी अर्थात् सम्पूर्ण भारत की विविधता को एक सूत्र में बनाए रखना
ताकि भारत भूमि की एकता और अखंडता बनी रहे।
लोकतंत्र को कामय रखने की चुनौती―लोकतंत्र को कायम रखना संविधान के समक्ष दूसरी
महत्त्वपूर्ण चुनौती थी अर्थात् भारतीय संविधान की बनावट और ढाँचागत संरचना विश्व में सबसे सुंदर
है। इसमें दी गई विशेषताओं और प्रावधानों पर वास्तविक अर्थों में खरा उतरना और स्वच्छ लोकतंत्र के
रूप में उदाहरण बनना।
विकास की चुनौती―संविधान के समक्ष तीसरी महत्त्वपूर्ण चुनौती विकास की थी। विकास से तात्पर्य
था―सबका भला हो, कोई पीछे न रहे। लोककल्याण ही मूल मंत्र हो तथा संविधान के प्रावधानों के 
अनुसार सबका विकास और भला हो।
 
प्रश्न 5. संस्थाओं का स्वरूप क्या होता है?
उत्तर― संस्थाओं का स्वरूप-संविधान मात्र दर्शन और मूल्यों का संग्रह नहीं है। संविधान इन
मूल्यों को संस्थागत रूप देने का प्रयास है। संविधान के द्वारा लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली
और दायित्व तय किये जाते हैं। समय के साथ संविधान में परिवर्तन की आवश्यकता होती है। अत:
संविधान निर्माताओं ने इसे जड़ नहीं समझा था अत: इसमें बदलाव की गुंजाइश के लिए प्रावधान भी
रखे। संविधान सरकार के लिए कुछ अधिकार देता है और सरकार के लिए एक सीमा निर्धारित कर
देता है जिससे वह नागरिक अधिकारों को हड़प न लें। मांटेस्क्यू की संतुलन की अवधारण विधायिका,
कार्यपालिका और न्यायपालिका पर लागू होती है। न्यायपालिका मौलिक अधिकार की संरक्षक है।
 
                                दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
 
प्रश्न 1. भारत के संविधान के बुनियादी मूल्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर―              भारतीय संविधान के बुनियादी मूल्य
भारतीय संविधान के उद्देश्य एवं मूल्यों की झलक भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अन्तर्गत मिलती
है, लेकिन भारतीय संविधान के उद्देश्य को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा के सामने 13
दिसम्बर, 1946 को एक प्रस्ताव के रूप में उपस्थित किया। इसे उद्देश्य प्रस्ताव के नाम से भी जाना
जाता है। हमारे संविधान की उद्देशिका या प्रस्तावना में, जिस रूप में उसे संविधान ने पास किया था,
कहा गया है हम, “भारत के लोग” भारत को एक प्रभुत्वसम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए
तथा उसके समस्त नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समानता दिलाने एवं उन सब में बंधुता बढ़ाने के
लिए दृढ़ संकल्प करते हैं। न्याय की परिभाषा सामाजिक, आर्थिक और आर्थिक न्याय के रूप में की गई
है। स्वतंत्रता में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता शामिल है और समानता
का मतलब है प्रतिष्ठा एवं अवसर की समानता।
 
                            भारतीय संविधान की प्रस्तावना
“हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष,
लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए एवं उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक एवं
राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और
अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और
अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में
आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को
एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”
 
                         प्रस्तावना के मुख्य शब्दों का अर्थ
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में आए प्रत्येक महत्त्वपूर्ण शब्द का अर्थ निम्नलिखित है―
(i) हम भारत के लोग, भारत को…―भारत के संविधान का निर्माण एवं अधिनियम भारत के
लोगों ने अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से किया है न कि इसे किसी राजा या बाहरी आदमी ने
उन्हें दिया है।
 
(ii) प्रभुत्वसम्पन्न―लोगों को अपने से जुड़े हर मामले में निर्णय करने का सर्वोच्च अधिकार है।
कोई भी बाहरी शक्ति भारत की सरकार को आदेश नहीं दे सकती।
 
(iii) समाजवादी―समाज में सम्पदा सामूहिक रूप से पैदा होती है एवं समाज में उसका बँटवारा
समानता के साथ होना चाहिए। सरकार जमीन तथा उद्योग-धंधे की हकदारी से जुड़े
कायदे-कानून इस प्रकार बनाए कि सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ कम हों।
 
(iv) पंथ-निरपेक्ष―नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने की पूरी स्वतन्त्रता है, परन्तु कोई धर्म
आधिकारिक नहीं है। सरकार सभी धार्मिक मान्यताओं और आचरणों को समान सम्मान देती
है। अर्थात् राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा।
 
(v) लोकतन्त्रात्मक―सरकार का एक ऐसा स्वरूप जिसमें लोगों को समान राजनैतिक अधिकार
प्राप्त रहते हैं, लोग अपने शासन का चुनाव करते हैं और उसे जवाबदेह बनाते हैं। विधायिका,
कार्यपालिका और न्यायपालिका में संतुलन कायम किया जाता है।
 
(vi) गणराज्य―शासन का प्रमुख लोगों द्वारा चुना हुआ व्यक्ति होगा न कि किसी वंश या
राज-खानदान का।
 
(vii) न्याय-नागरिकों के साथ उनकी जाति, धर्म एवं लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा
सकता।
 
(viii) स्वतन्त्रता-नागरिक कैसे सोचें, किस तरह अपने विचारों को अभिव्यक्त करें तथा अपने
विचारों पर किस तरह अमल करें, इस पर कोई अनुचित पाबंदी नहीं है।
 
(ix) समता-कानून के समक्ष सभी लोग समान हैं। पहले से चली आ रही सामाजिक असमानताओं
को खत्म करना होगा।
 
(x) बंधुता-हम सभी ऐसा आचरण करें जैसे कि हम एक परिवार के सदस्य हों। कोई भी
नागरिक किसी दूसरे नागरिक को अपने से कमतर न समझे।
 
प्रश्न 2. संविधान सभा के विषय में क्या जानते हो?
उत्तर―                      संविधान सभा
द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होते ही सन् 1946 में ब्रिटिश सरकार ने एक कैबिनेट मिशन भारत भेजा।
कैबिनेट मिशन के आगमन के साथ संविधान सभा के गठन का कार्य प्रारम्भ हो गया, परन्तु इसका
गठन की प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग में मतभेद हो गया। इस मतभेद का मुख्य कारण
ब्रिटिश प्रान्तों को तीन समूहों में बाँटा जाना, तीनों समूहों को अलग रहने या संघ में मिल जाने की छूट
आदि थे। इन गतिरोधों के बावजूद संविधान सभा के लिए जुलाई, 1946 में चुनाव हुए और 9
दिसम्बर, 1946 तक संविधान सभा का निर्माण कार्य पूरा हो गया। इस संविधान सभा में कुल 296
सदस्य थे। कांग्रेस के 208, लीग 73, यूनियनिस्ट, यूनियनिस्ट मुस्लिम, यूनियनिस्ट अनुसूचित जातियाँ,
कृषक प्रजा, अनुसूचित जाति परिसंघ, सिक्ख (गैर-कांग्रेसी) कम्युनिस्ट क्रमश: 1 सीट और स्वतंत्र 8
को 8 सीटें मिली। बाद में विभाजन के पश्चात् 299 सदस्य रह गये थे। जिनमें डॉ० राजेन्द्र प्रसाद,
जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ० अंबेडकर, तेज बहादुर सपू, सरोजिनी नायडू के नाम विशेष
रूप से उल्लेखनीय हैं। संविधान सभा का विधिवत उद्घाटन नियत दिन सोमवार, 9 दिसम्बर, 1946
को प्रात: ग्यारह बजे हुआ।
डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष और डॉ० राजेन्द्र प्रसाद इसके स्थायी अध्यक्ष
नियुक्त किए गए।
 
प्रश्न 3. भारत संविधान निर्माण के विषय में क्या जानते हो?
उत्तर―                  भारतीय संविधान निर्माण
भारत में आजादी की लड़ाई के दौरान ही लोकतन्त्र समेत अधिकांश बुनियादी बातों पर राष्ट्रीय सहमति
बनाने का काम हो चुका था। भारत के देशभक्तों ने आजादी के दौरान कुछ सिद्धान्त और आदर्शों का
निर्माण किया था और संघर्ष ने उन आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रेरणा दी थी।
सन् 1928 में ही मोतीलाल नेहरू और कांग्रेस के आठ अन्य नेताओं ने भारत का एक संविधान लिखा
था एवं सन् 1931 में कराची में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन के एक प्रस्ताव में यह
रूपरेखा रखी गई थी कि आजाद भारत का संविधान कैसा होगा। इन दोनों ही दस्तावेजों में स्वतन्त्र
भारत के संविधान में सार्वभौम वयस्क मताधिकार, स्वतन्त्रता और समानता का अधिकार और
अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की बात कही गई थी। इसके अलावा अतिरिक्त औपनिवेशिक
शासन की राजनैतिक संस्थाओं और व्यवस्थाओं को जानने-समझने से भी नई राजनैतिक संस्थाओं का
स्वरूप तय करने में मदद मिली। हालाँकि अंग्रेजी शासन ने बहुत कम लोगों को वोट का अधिकार दिया
था और इसके आधार पर जिस विधायिका का गठन किया था, वह बहुत कमजोर थी। सन् 1937 के
बाद पूरे ब्रिटिश शासन वाले भारत में प्रादेशिक असेंबलियों के लिए चुनाव कराए गए थे और इनमें बनी
सरकारें भी पूरी तरह लोकतान्त्रिक नहीं थीं। 1935 के ऐक्ट का भारत के संविधान में अहम योगदान
माना जाता है। 1945-46 में भी चुनाव हुए जिनसे भारतीय संविधान निर्माताओं की समझ विकसित हुई।
9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा का गठन किया। डॉ० सच्चिदानंद सिन्हा को संविधान सभा का
अस्थायी अध्यक्ष और बाद में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद को इसका स्थायी अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
प्रारूप समिति का गठन―29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा द्वारा एक प्रारूप समिति का गठन
किया गया। डॉ० भीमराव अंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनाए गए संविधान के प्रारूप संशोधन
पर बहुत सी टिप्पणियाँ, आलोचनाएँ और सुझाव आये जब इसे प्रथम बार 21 फरवरी, 1948 को
संविधान सभा के अध्यक्ष को पेश किया गया। कतिपय संशोधन स्वीकार किये गये। इस प्रारूप को पुनः
फरवरी, 1948 में प्रकाशित किया गया और इसे 4 नवम्बर, 1948 को संविधान सभा के सामने पेश
किया गया, इसी कारण डॉ० अंबेडकर को ‘भारतीय संविधान का जनक’ कहा जाता है।
संविधान के प्रारूप की स्वीकृति―संविधान के प्रारूप पर संविधान सभा में 144 दिनों तक विचार
होता रहा। उसमें 2,473 संशोधन पेश किए गए और 26 नवम्बर, 1949 को नया संविधान अन्तिम
रूप से स्वीकार कर लिया गया। इस स्वीकृत संविधान में 395 अनुच्छेद, 22 भाग एवं 8 अनुसूचियाँ
थीं।
संविधान का उद्घाटन―भारत के नए संविधान का उद्घाटन 26 जनवरी, 1950 को किया गया।
इसी दिन से नवनिर्मित संविधान सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया, तत्पश्चात् भारत गणतन्त्र बन
गया। इसी कारण 26 जनवरी को हम लोग गणतन्त्र दिवस मनाते हैं।
 
प्रश्न 4. दक्षिण अफ्रीका रंगभेद संघर्ष को समझाइये।
उत्तर― रंगभेद नीति रंग के आधार पर भेदभाव की वह प्रणाली थी जो दक्षिण अफ्रीका में यूरोपीय
श्वेत लोगों द्वारा थोप दी गई थी। सत्रहवीं एवं अठारहवीं शताब्दी में यूरोप की व्यापार करने वाली
कंपनियों ने इस पर बलपूर्वक अधिकार कर दिया और स्थानीय शासक बन गई। रंगभेद नीति ने लोगों
को श्वेत एवं अश्वेत चमड़ी के आधार पर विभाजित कर दिया। दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासी काले
रंग के है। ये पूरी आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा थे और इन्हें अश्वेत कहा जाता था। इन दो समूहों के
अतिरिक्त (श्वेत एवं अश्वेत) मिश्रित नस्ल वाले लोग भी थे जिन्हें रंगीन चमड़ी वाले कहा जाता था।
गोरे (श्वेत) अल्पसंख्यक लोगों ने सरकार बनाई और रंगभेद की नीति अपनाई।
वे अश्वेतों को हीन समझते थे। अश्वेतों को वोट का अधिकार नहीं दिया गया था। रंगभेद नीति अश्वेतों
के लिए विशेष रूप से दमनकारी थी। उन्हें गोरों के लिए आरक्षित क्षेत्रों में रहने का अधिकार नहीं था।
वे गोरों के लिए आरक्षित क्षेत्रों में तभी काम कर सकते थे जब उनके पास उसका अनुमति-पत्र हों।
श्वेत एवं अश्वेत लोगों के लिए रेलगाड़ियाँ, बसें, टैक्सियाँ, होटल, अस्पताल, स्कूल कॉलेज,
पुस्तकालय, सिनेमा हाल, थियेटर, समुद्र तट, तरण ताल, जन-शौचालय आदि अलग-अलग थे। यहाँ
तक कि गिरजाघरों में भी उनका प्रवेश वर्जित था जहाँ पर श्वेत लोग पूजा करते थे। अश्वेतों को संगठन
बनाने या इस भयानक बर्ताव का विरोध करने की अनुमति नहीं थी।
1950 तक अश्वेत, रंगीन चमड़ी वाले लोग एवं भारतीय मूल के लोग रंगभेद नीति के विरुद्ध लड़ते
रहे। उन्होंने विरोध यात्राएँ निकाली एवं हड़ताले कीं। अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस (एएनसी) नामक दल
ने इस संघर्ष का नेतृत्व किया जिसने जल्दी ही गति पकड़ ली।
बढ़ते हुए विरोधों एवं संघर्षों से सरकार को यह अहसास हो गया कि वे अश्वेतों को और अधिक समय
तक दमन करके अपने शासन के अधीन नहीं रख सकते थे और श्वेतों की हुकूमत अपनी नीतियाँ
बदलने के लिए बाध्य हो गई। रंगभेद वाले कानूनों को समाप्त कर दिया गया। राजनैतिक दलों एवं
मीडिया पर लगे प्रतिबंध हटा लिए गए। 28 वर्ष तक जेल में कैद रखने के बाद नेल्सन मंडेला को
आजाद कर दिया गया। अंतत: 26 अप्रैल, 1994 की अर्द्धरात्रि के बाद दक्षिण अफ्रीका गणराज्य का
नया लाल झण्डा लहराया गया। इसने विश्व में एक नए लोकतंत्र के जन्म को चिह्नित किया। इस प्रकार
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद वाली सरकार समाप्त हो गई जिससे सभी नस्लों की मिली-जुली सरकार के
गठन का रास्ता खुला।
 
प्रश्न 5. दक्षिण अफ्रीका ने कैसे एक नए संविधान को समता और ठोस अधिकारों को
रखकर साकार रूप दिया?
उत्तर― दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आन्दोलन के सफल रहने और 28 वर्षों तक कैद की
सजा काटने के बाद नेल्सन मंडेला सन् 1990 में रिहा हुए। रंगभेद की नीति समाप्ति के कगार पर
पहुँच गई एवं तत्कालीन श्वेत राष्ट्रपति डी० क्लार्क ने उदार और समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाया।
उन्होंने रंगभेद समाप्त कर दिया और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और अन्य अश्वेत दलों के साथ समझौते
की नीति अपनाई। 26 अप्रैल, 1994 की मध्यरात्रि को दक्षिण अफ्रीका का नया झण्डा लहराया और
नेल्सन मंडेला ने राष्ट्रीय सरकार का गठन किया। नोबेल पुरस्कार प्राप्त मंडेला ने राष्ट्रपति पद ग्रहण
करने के बाद कहा कि वे सभी नस्ल के लोगों को आदर एवं सम्मान देंगे, वे बदले की भावना से काम
नहीं करेंगे। उनके लिए सब बराबर हैं, वे श्वेत या अश्वेत आधिपत्य के विरुद्ध हैं। यह देश सबका है।
इस असाधारण बदलाव के बाद नए दक्षिण अफ्रीका के पहले राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला के
शब्द―“ऐतिहासिक रूप से एक-दूसरे के दुश्मन रहे दो समूह रंगभेद वाली शासन व्यवस्था की जगह
शांतिपूर्ण ढंग से लोकतान्त्रिक व्यवस्था अपनाने पर सहमत हो गए; क्योंकि दोनों को एक-दूसरे की
भलमनसाहत पर भरोसा था और वे इसे मानने को तैयार थे। मेरी कामना है कि दक्षिण अफ्रीकी लोग
कभी भी अच्छाई पर विश्वास करना न छोड़ें और इस बात में आस्था रखें कि मनुष्य जाति पर विश्वास
करना ही हमारे लोकतन्त्र का आधार है।” नए लोकतान्त्रिक दक्षिण अफ्रीका के उदय के साथ ही
अश्वेत नेताओं ने अश्वेत समाज से आग्रह किया कि सत्ता में रहते हुए गोरे लोगों ने जो जुल्म किए थे,
उन्हें वे भूल जाएँ और गोरों को माफ कर दें। मंडेला ने कहा कि अब सभी नस्लों तथा स्त्री-पुरुष की
समानता, लोकतान्त्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों पर आधारित नए दक्षिण अफ्रीका
का निर्माण करें। एक पार्टी ने दमन और नृशंस हत्याओं के जोर पर शासन किया था एवं दूसरी पार्टी ने
आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया। नए संविधान के निर्माण हेतु दोनों ही साथ-साथ बैठी।
18 नवम्बर, 1993 को ही अश्वेतों को मतदान का अधिकार देने और अल्पसंख्यक श्वेत शासन को
समाप्त करने के लिए अन्तरिम संविधान की रचना कर दी गई। अन्तरिम संविधान के अन्तर्गत 400
सदस्यीय राष्ट्रीय सभा एवं 90 सदस्यों वाली सीनेट की व्यवस्था की गई। नवनिर्वाचित संसद को देश
का स्थायी संविधान बनाने का अधिकार दिया गया। संविधान को बनाने में 1 वर्ष, 10 माह, 28 दिन
लगे। इस ऐतिहासिक क्षण पर नेल्सन मंडेला ने कहा था, “हम एक युग की समाप्ति और नए युग के
आगमन की दहलीज पर हैं। हमारे देश के इतिहास में पहली बार 27 अप्रैल, 1994 को सभी दक्षिण
अफ्रीकी, चाहे उनकी भाषा, धर्म और संस्कृति कुछ भी हो, उनका रंग या वर्ग जो भी हो, समान
नागरिकों के रूप में मतदान करेंगे।”
इस प्रकार, दक्षिण अफ्रीका का नया संविधान बना जो विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान कहलाया। यह
दुनिया में इतने व्यापक अधिकार संविधान द्वारा देने वाला प्रथम देश बना। इसमें नागरिकों साम्यवादी
शासन व्यवस्था वाले ठोस अधिकारों को दिया गया है।
दक्षिण अफ्रीका के लोगों ने मतभेद भुलाकर समझदारी से मिलकर कार्य किया जिससे आज यह
लोकतंत्र का मॉडल देश बनकर उभरा है।
 
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