UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 6 श्रम एव विजयते (गद्य – भारती)

By | May 23, 2022

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 6 श्रम एव विजयते (गद्य – भारती)

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 6 श्रम एव विजयते  (गद्य – भारती)

पावसाश

श्रम की परिभाषा (अर्थ)-उद्देश्यपूर्वक किया गया प्रयत्न श्रम कहलाता है। कर्म के बिना मनुष्यों को ही नहीं, पशु-पक्षियों को भी जीवन-निर्वाह कठिन है। कर्म, बिना श्रम के नहीं हो सकता। इसीलिए कहा जाता है कि ‘श्रम ही जीवन है’ और श्रम का अभाव ‘निर्जीवता’। कर्म से ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि पुरुषार्थों की प्राप्ति हो सकती है। |

श्रम का महत्त्व–उत्साह मनुष्य को श्रम में लगाता है और श्रम मनुष्य को कर्म में प्रवृत्त करता है। इस प्रकार कर्म और श्रम इन दोनों की पारस्परिक सापेक्षता है। श्रमपरायण मानव भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति करता है। परिश्रमी मनुष्य ‘करो या मरो’ की भावना को प्रमाणित करता है। इसीलिए श्रमपरायण मनुष्य को अपना लक्ष्य सदैव अधिक-से- अधिक समीप आता हुआ प्रतीत होता है। उद्यम के बिना तो भाग्य भी निरर्थक ही सिद्ध होता है। ,

श्रम ही सन्मित्र है-श्रम मानव का उत्तम मित्र है। जैसे मित्र विपत्ति आने पर सहानुभूतिपूर्वक कष्टो को दूर करके मित्र का हित करता है, उसी प्रकार श्रम भी मनुष्य का मनोबल बढ़ाकर कल्याण करता है। श्रम योग से कम नहीं है। योग की तरह श्रम में भी चित्त की एकाग्रता आवश्यक है। श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ कहकर श्रम का ही महत्त्व बताया है। श्रमशील मानव कष्टों की परवाह न करके अपने कार्य को पूर्ण करता हुआ योगी ही है। ऐसे मनुष्य की सफलता निश्चित ही होती है। “उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः” उक्ति भी इसी बात की पुष्टि करती है।

अमहीनता अभिशाप है-श्रमहीनता से ही मानव निर्बल, उदासीन, उत्साहरहित और अन्त में निराश हो जाता है। उसे अपने ऊपर भी भरोसा नहीं रहता। वह लोगों द्वारा केवल अपयश प्राप्त करता है। वह परालम्बन को श्रेष्ठ समझने लगता है। इस प्रकार आलस्य अर्थात् श्रमहीनता मनुष्य के शरीर में स्थित होकर उसका महाशत्रु बन जाता है।

कर्म और भाग्य-आलस्य ऐसा शत्रु है, जो किसी भी व्यक्ति की शक्ति को क्षीण करता है। जो व्यक्ति परिश्रम करने पर भी सफलता नहीं पाता, वह अपने भाग्य को कोसता हुआ परिश्रम को व्यर्थ मानने लगता है। वह यह नहीं जानता कि पूर्वजन्म में किया गया कर्म ही भाग्य होता है। अतः मनुष्य को श्रमपूर्वक  नियमित रूप से कर्म करते रहना चाहिए। कर्म से सहित मानवों से कर्मशील मनुष्य श्रेष्ठ होते :श्रमपूर्वक नियमित रूप से कर्म करते रहना चाहिए। कर्म से सहित मानवों से कर्मशील मनुष्य श्रेष्ठ होते

श्रम का शक्ति से सम्बन्ध–बलशाली ही कार्य करने में समर्थ है, यह विचार भ्रमपूर्ण है। छोटे-से शरीर वाले दीमक एक बड़ी बाँबी बना देते हैं और उससे थोड़ी-सी बड़ी मधुमक्खियाँ जरा-जरा-सा मधु लाकर मधु का एक भण्डारे संचित कर लेती हैं। अतः श्रम के लिए बल की नहीं, वरन् दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। श्रम के लाभ-परिश्रम मनुष्य के अपने पोषण के लिए ही नहीं है, क्रन् मनुष्य किये गये कर्मो से दूसरों का भी उपकार करता है। किसान परिश्रम से अन्न उत्पन्न कर लोगों का पोषण करता है। श्रमिक अपने परिश्रम से उत्पादन की वृद्धि करता है। मानव पाताल में, अगाध जल में, आकाश में, सुदुर्गम पर्वत पर, घने जंगल में भी श्रम से कठिन कार्य पूरे करता है। देश की प्रगति पसीने की बूंदों पर ही निर्भर है।

उद्योगों में श्रमिकों की स्थिति-जिस राष्ट्र में श्रम में निष्ठा रखने वाले लोग होते हैं, वहाँ उत्पादन बढ़ता है और किसी वस्तु का अभाव नहीं होता है। आजकल अनेक वस्तुओं के उत्पादन के लिए उद्योगशालाओं (फैक्ट्रियों) में हजारों श्रमिक कार्य करते हैं। हमारे देश में दो प्रकार के कारखाने हैं–सरकारी और व्यक्तिगत (प्राइवेट)। सरकारी उद्योगों का लक्ष्य लौह आदि कच्चा माल तैयार करना, बड़ी मशीनें बनाना तथा रसायन तैयार करना है। यहाँ लाभ कमानी उद्देश्य नहीं है। प्राइवेट फैक्ट्रियों में तो लाभ कमाना ही उद्देश्य होता है, क्योंकि उनमें धनी अपनी पूँजी और श्रमिक अपना श्रम लगाते हैं। उद्योगशालाओं का प्रबन्ध धनिकों के हाथ में ही होती है; अतः वे अधिक लाभ लेते हैं, श्रमिकों को थोड़ा देता है। इससे पूँजीपतियों और श्रमिकों में अनेक विवाद उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार के विवादों को निपटाने के लिए सरकार ने ‘श्रम मन्त्रालय तथा ‘श्रम न्यायालय की स्थापना की है। श्रमिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा हेतु सरकार अनेक नियम-कानून भी बना चुकी है; फिर भी विकसित देशों की तुलना में हमारे देश के श्रमिकों की दशा नहीं सुधरी है और न ही उत्पादन बढ़ा है। जब तक हम पवित्र मन से श्रम नहीं करेंगे, तब तक सफलता प्राप्त नहीं हो सकती है।

गद्यांशों को ससन्दर्भ अनुवाद 

(1) सोद्देश्यं कर्मणि क्रियमाणः प्रयत्नः श्रम। निखिलमपि विश्वं कर्मणि प्रतिष्ठितम्। कर्म विना न केवलं मानवस्य अपितु पशुपक्षिणामपि जीवननिर्वाहः सुदुष्करः। धर्मार्थकाममोक्षादिपुरुषार्थाः कर्मणैव लब्धं शक्यन्ते। क्षमेण विना तु साफल्यं खपुष्पायितमेव। अतएव श्रम एवं जीवनं तदभावश्च अस्तित्वभयमिति निश्चीयते। ।

शब्दार्थ-
सोद्देश्यं = उद्देश्य के साथ।
निखिलम् = सम्पूर्ण।
प्रतिष्ठितम् = आधारित, स्थित।
सुदुष्करः = अत्यधिक कठिन।
कर्मणैव = कर्म के द्वारा ही।
खपुष्पायितम् = आकाश-कुसुम के समान, असम्भव।

सन्दर्थ
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ में संकलित ‘श्रम एव विजयते’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

संकेत
इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।] प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में श्रम के अर्थ तथा महत्त्व को बताया गया है।

अनुवाद
उद्देश्यपूर्वक कर्म के लिए किया गया प्रयत्न श्रम कहलाता है। सम्पूर्ण संसार ही कर्म पर आधारित है। कर्म के बिना केवल मानव का ही नहीं, अपितु पशु-पक्षियों का भी जीवन-निर्वाह अत्यन्त कठिन है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि पुरुषार्थ कर्म से ही प्राप्त हो सकते हैं। श्रम के बिना तो सफलता आकाश-कुसुम के समान असम्भव है। इसलिए श्रम ही जीवन है और उसका अभाव अर्थात् श्रम का न होना (जीवन के) अस्तित्व को खतरा है, यह निर्विवाद सत्य है।

(2) कर्मण्युत्साह श्रमस्य प्रयोजकः श्रमश्च कर्मणि, नियोजकः इत्यनयोः परस्परम् अपेक्षित्वम्। श्रमो न केवलं भौतिक क्षमतां तनोति अपितु आत्मशक्तेरप्युत्कर्ष जनयति। श्रमशीलो जनः ‘कार्यं वा साधयेयं देहं वा पातयेयम्’ इति भावनामेव सततं प्रमाणयति। येन लक्ष्यं स्वयमेव समीपतरम् आगच्छदिव प्रतिभाति। उद्यमहीनं तु मन्ये कर्मफलप्रदाता विधिरपि अजोगलस्तनमिव निरर्थकं मन्यते। यथोक्तञ्च

उद्यमः साहसं धैर्यं, बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र साहाय्यकृत् विभुः॥

शब्दार्थ-
प्रयोजकः = प्रयोक्ता (कराने वाला)।
अपेक्षित्वं = अपेक्षित होना।
तनोति = बढ़ाता है।
उत्कर्षम् = उन्नति को।
जनयति = उत्पन्न करता है।
प्रमाणयति = प्रमाणित करता है।
समीपतरम् = अत्यधिक निकट।
आगच्छदिव = आता हुआ-सा।
प्रतिभाति = प्रतीत होता है।
प्रदाता = देने वाला।
विधिः = ब्रह्मा।
अजागलस्तनमिव = बेकरी के गले के स्तन के समान।
साहाय्यकृत = सहायक, सहयोगी।
विभुः = ईश्वर, व्यापक।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में श्रम के महत्त्व को बताया गया है।

अनुवाद
कर्म में उत्साह श्रम का कराने वाला है और श्रम कर्म में लगाने वाला है। इस प्रकार दोनों की आपस में आवश्यकता (निर्भरता) है। श्रम केवल भौतिक योग्यता को ही नहीं बढ़ाता, अपितु आत्मबल की उन्नति को भी उत्पन्न करता है। परिश्रमी मनुष्य “कार्य पूरा करूंगा या शरीर को नष्ट कर दूंगा।” इस भावना को ही निरन्तर प्रमाण मानता है, जिससे लक्ष्य स्वयं ही समीप आता हुआ-सा प्रतीत होता है। उद्यमहीन मनुष्य को कर्म के फल को देने वाले ब्रह्मा भी बकरी के गले के स्तन के समान व्यर्थ. ही समझता है। जैसा कि कहा गया है| उद्यम, साहस, धीरज, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम-ये छः जहाँ होते हैं, वहाँ ईश्वर भी सहायता करता है।

(3) श्रम एव जीवनस्य सन्मित्रम्।यथा सन्मित्रं विपन्नदशायां मित्रं प्रति सहानुभूतिं प्रकटयति, तस्य कष्टान्यपहाय सर्वथा हितसाधनं करोति तस्य जीवनं च जीवितुं काम्य- माकलयति तथैवे अमोऽपि मानवस्य मनोबलं वर्धयित्वा कल्याणं वितनोति। श्रमेण विना क्व कर्मकौशलम्? यथा योगे  चित्तस्यैकाग्रताऽपरिहार्या तथैव श्रमेऽपि। श्रीमद्भगवद्गीतायां योगः कर्मसु कौशलम्’ इति प्रमाणयता योगिराजेन श्रीकृष्णेन प्रकारान्तरेण श्रमस्यैव महिमा प्रतिष्ठापितः। कष्टान्यविगणय्य स्वकार्यं पूरयितुं यतमानः श्रमशीलः नरः वस्तुतः युञ्जानो योगी एव भवति। साफल्यं तत्र सुनिश्चितमेव।’उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः’ इति उक्तिस्तदेव द्रढयति। |

शब्दार्थ-
सन्मित्रम् = उत्तम मित्र।
विपन्नदशायाम् = विपत्ति की हालत में प्रकटयति = प्रकट करता है।
अपहाय = दूर करके।
काम्यमाकलयति (काम्यम् + आकलयति) = कामना (चाहने) का आकलन करता है।
वर्धयित्वा = बढ़ाकर।
वितनोति = विस्तार करता है।
क्व = कहाँ।
अपरिहार्या = न छोड़ने योग्य।
अविगणय्य = न गिनकर, परवाह न करके।
यतमानः = प्रयत्नशील, प्रयास करता हुआ।
युञ्जानः = योगाभ्यास में लगा हुआ।
उपैति = पास जाती है।
द्रढयति = मजबूत बनाता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में श्रम को प्राणियों का मित्र बताते हुए उसे योग के सदृशं कहा गया है।

अनुवाद
श्रम ही जीवन का उत्तम मित्र है। जैसे अच्छा मित्र विपत्ति की दशा में मित्र के प्रति सहानुभूति प्रकट करता है, उसके कष्टों को दूर कर सब प्रकार से उसका हित करता है, उसके जीवन को जीने के लिए चाहने योग्य समझता है, उसी प्रकारे श्रम भी मनुष्य के मनोबल को बढ़ाकर कल्याण को करता है। श्रम के बिना कर्म में कुशलता कहाँ? अर्थात् परिश्रमपूर्वक जो कर्म नहीं किया जाता, वह सुफल नहीं होता है। जिस प्रकार योग में चित्त की एकाग्रता छोड़ी नहीं जा सकती, उसी प्रकार श्रम में भी। श्रीमद्भगवद्गीता में “कर्म में कुशलता ही योग है’ यह प्रमाणित करते हुए योगिराज श्रीकृष्ण ने दूसरे प्रकार से श्रमकी ही महिमा स्थापित की है। कष्टों की गिनती (गणना) न करके अपने कार्य को पूरा करने के लिए प्रयत्न करता हुआ मनुष्य वस्तुतः (वास्तव में) योग में लगा हुआ योगी ही होता है। उसमें (व्यक्ति की) सफलता तो निश्चित है ही। ‘लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास जाती है’ यह उक्ति उसी (पूर्वोक्त कथन) की पुष्टि करती है।

(4) श्रमेण हीनः मानवः निर्बलः उदासीनः उत्साहहीनः अन्ते च सर्वत्र निराशो भवति। शरीरस्थबलमजानन् स्वस्मिन्नपि न विश्वसिति। विषण्णमनाः जनेभ्यः केवलमपकीर्तिमेवार्जयति। स्वावलम्बमविगणय्य परावलम्बं श्रेयस्करं मनुते। कश्चित् समर्थोऽपि जने आलस्यात् श्रमं न कुरुते। यत्किञ्चिदवाप्यापि तुष्यति। शरीरस्थेन आलस्यरूपिणा शत्रुणा तस्य शक्तिः शनैः-शनैः क्षीयते। यः कश्चित् परिश्रमे कृतेऽपि सिद्धि न लभते; मन:कामना न पूर्यते; तर्हि ‘विधिरनतिक्रमणीयः’ इति मत्वा भाग्यं कुत्सयन् प्रयत्नं परिश्रमञ्च व्यर्थमाकलयति। से

तथ्यमिदं न वेत्ति यत् प्राग्विहितं कर्म एव भाग्यमिति सर्वैः स्वीक्रियते। वस्तुतः कर्मविरतेभ्यो जनेभ्यः कर्मशीलाः मानवाः श्रेष्ठा। तथा चोक्तम् श्रीमद्भगवद्-गीतायाम्

नियतं कुरु कर्म त्वं, कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः॥

शब्दार्थ-
केवलमपकीर्तिमेवार्जयति (केवलम् + अपकीर्तिम् + एव + अर्जयति) = केवल . अयश ही कमाता है।
स्वावलम्बमविगणय्ये (स्व + अवलम्बम् + अविगणय्य) = अपने सहारे की गणना न करके।
मनुते = मानता है।
यत्किञ्चिदवाप्यापि (यत् + किञ्चिद् + अवाप्य + अपि) = जो कुछ प्राप्त करके भी।
तुष्यति = सन्तोष करता है।
क्षीयते = कम हो जाती है।
विधिः अनतिक्रमणीयः = भाग्य का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता।
कुत्सयन् = कोसता हुआ।
व्यर्थम् आकलयति = बेकार समझता है।
प्राग्विहितम् = पूर्व (जन्म) में किया गया।
कर्मविरतेभ्यः = कर्म से उदासीन।
नियतं = निश्चित रूप से।
ज्यायः = बड़ा।
शरीरयात्रा = जीवन-निर्वाह।।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में श्रमहीनता से श्रमशीलता को श्रेष्ठ बताया गया है।

अनुवाद
श्रम से हीन मनुष्य कमजोर, उदासीन, उत्साहरहित और अन्त में सभी स्थानों पर निराश हो जाता है। शरीर की शक्ति को न जानता हुआ अपने पर ही विश्वास नहीं करता है। दु:खी मन होकर लोगों से केवल बदनामी को ही प्राप्त करता है। स्वावलम्बन की उपेक्षा करके दूसरे पर निर्भरता (परावलम्बन) को ही कल्याणकारी मानता है। कोई व्यक्ति समर्थ होता हुआ भी आलस्य के कारण श्रम नहीं करता है। थोड़ा-सा पाकर भी सन्तुष्ट हो जाता है। शरीर में स्थित आलस्य-रूपी शत्रु उसकी शक्ति को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। जो कोई परिश्रम करने पर भी सफलता को नहीं प्राप्त करता है, उसके मन की इच्छा पूरी नहीं होती है, तब ‘भाग्य न टालने योग्य होता है, ऐसा मानकर भाग्य को कोसता हुआ प्रयत्न और परिश्रम को व्यर्थ समझ लेती है। वह इस तथ्य को नहीं जानता कि “पूर्व (जन्म) में किया गया कर्म ही भाग्य होता है, यह सभी स्वीकार करते हैं। निश्चय ही (वास्तव में) कर्म से उदासीन लोगों से परिश्रमी मनुष्य श्रेष्ठ । जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है

तुम निश्चित कर्म को करो; क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तुम्हारा जीवन-निर्वाह भी असम्भव है।

(5) ऐतरेयब्राह्मणे सुराधिपः पुरन्दरः राज्ञः हरिश्चन्द्रस्यात्मजहितमुपदिशन् सुखैश्वर्यमवाप्तुं परिश्रमस्यावश्यकतां वैशद्येन प्रकाशयति। यथा हि

चरन्चै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्।।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो ने तन्द्रयते चरन्॥

बलिष्ठतनुः एव महत् कार्य सम्पादयितुं समर्थ इति भ्रमात्मको विचारः यतो हि क्षुद्रा पिपीलिका महान्तं वल्मीकं निर्माति। स्तोकं स्तोकं कृत्वा क्षुद्रा मधुमक्षिका विपुलं मधुराशिं सञ्चिनोति। अतएव श्रमस्य कृते दृढसङ्कल्पः यथोपेक्ष्यते न तथा शारीरिकस्य बलस्यापेक्षा। |

शब्दार्थ—
सुराधिपः = देवताओं के राजा।
पुरन्दरः = इन्द्र।
अवाप्तुम् = प्राप्त करने के लिए।
वैशद्येन = स्पष्ट रूप से, विस्तार से प्रकाशयति = प्रकाशित (प्रकट) करता है।
चरन् = चलता हुआ।
विन्दति = प्राप्त करता है।
स्वादुम् उदुम्बरम् = स्वादिष्ट गूलर फल को।
तन्द्रयते = आलस्य करता है।
बलिष्ठतनुः =.शक्तिशाली शरीर वाला।
सम्पादयितुं = पूरा करने के लिए।
पिपीलिका = चींटी।
वल्मीकम् = मिट्टी का ढेर।
स्तोकं स्तोकं कृत्वा = थोड़ा-थोड़ा करके।
विपुलं = अधिक।
मधुराशिं = अत्यधिक शहद को।
सञ्चिनोति = एकत्र करती है।
यथा अपेक्ष्यते = जिस प्रकार आवश्यक है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में इस बात को भ्रमात्मक बताया गया है कि शक्तिशाली शरीर वाला ही महान् कार्य कर सकता है।

अनुवाद
ऐतरेय ब्राह्मण में देवताओं के राजा इन्द्र राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र को (उसके) हित का उपदेश देते हुए सुख और ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिए परिश्रम की आवश्यकता को विस्तार से प्रकट करते (कहते) हैं। जैसा कि
निश्चय से अर्थात् निरन्तर चलता हुआ (प्राणी) मधु (जिस परिणामरूपी मीठे फल को) प्राप्त करता है। (निरन्तर) चलता हुआ (प्राणी) स्वादिष्ट गूलर के फल को प्राप्त करता है। सूर्य के प्रकाश को देखो, जो चलता हुआ आलस्य नहीं करता है।

बलवान् शरीर वाला ही महान् कार्य को करने में समर्थ है’ यह भ्रमपूर्ण विचार है; क्योंकि तुच्छ चींटी बड़े मिट्टी के ढेर (बाँबी) को बनाती है। तुच्छ मधुमक्खी थोड़ा-थोड़ा करके बहुत अधिक.शहद को इकट्ठा करती है। अतएव श्रम के लिए दृढ़ संकल्प की जितनी आवश्यकता है, उतनी शारीरिक बल की नहीं।

(6) परिश्रमः मनुजस्यं न केवलं स्वस्यैव पोषणाय, अपितु अपरेषां कृतेऽपि महान् उपकारकः। कृषिप्रधाने देशे कृषकः प्रचण्डग्रीष्मकालस्योष्णतां शीतकालस्य शैत्यञ्च सहभानः। यावद्दिनं कार्यं करोति, महता श्रमेण अन्नान्युत्पाद्य जनानां पोषणं करोति। औद्योगिकप्रतिष्ठानेषु कार्यालयेषु च श्रमिकः श्रमं सम्पाद्योत्पादनस्य वृद्धि करोति। मानवः पृथिव्या अन्तस्तले, अगाधे जले, विस्तृते आकाशे, सुदुर्गमे पर्वते, गहने काननेऽपि श्रमैकसाध्यं दुष्करं कार्यं करोति। श्रमस्वेदबिन्दुभिः पृथ्वीमातुरर्चनं करोति। श्रमस्वेदबिन्दवः एवामूल्यानि मौक्तिकानि येषु देशस्य प्रगतिराश्रिता।

शब्दार्थ-
स्वस्यैव = अपने ही।
अपरेषां कृतेऽपि = दूसरों के लिए भी।
यावद्दिनम् = दिनभर उत्पाद्य = उत्पन्न करके। सम्पाद्य = करके।
अन्तस्तले = भीतर।
अगाधेजले = गहरे पानी में।
श्रमैकसाध्यम् = केवल परिश्रम से होने वाला।
दुष्करं = कठिन।
श्रमस्वेदबिन्दुभिः = पसीने की बूंदों से।
पृथ्वीमातुरर्चनं (पृथ्वी + मातुः + अर्चनम्) = धरती माता की पूजा।
मौक्तिकानि = मोती।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि मनुष्य परिश्रम से केवल अपना ही नहीं, अपितु दूसरों का भी उफ्फार करता है। |

अनुवाद
परिश्रम मनुष्य के केवल अपने ही पोषण के लिए नहीं है, अपितु दूसरों के लिए भी महान् उपकार करने वाला है। कृषि-प्रधान देश में किसान भयंकर ग्रीष्म ऋतु की गर्मी को और शीतकाल की ठण्ड को सहन करता हुआ दिनभर कार्य करता है। बड़े (अधिक) श्रम से अन्न पैदा करके लोगों को पोषण करता है। औद्योगिक कारखानों में और कार्यालयों में मजदूर परिश्रम करके उत्पादन को बढ़ाता है। मनुष्य पृथ्वी के गर्भ में, गहरे जल में, विस्तृत आकाश में, अत्यन्त दुर्गम पर्वत | पर, घने जंगल में भी केवल श्रम से ही हो सकने वाले कठिन कार्य को करता है। पसीने की बूंदों से पृथ्वी माता की पूजा करता है। पसीने की बूंदें ही अमूल्य मोती हैं, जिन पर देश की उन्नति निर्भर करती

(7) यस्मिन् राष्ट्रे श्रमे निष्ठां दधानाः जीविकोपार्जनस्यानुकूलावसरान् लभन्ते, कुटुम्बस्योत्कर्षाय प्रभवन्ति तत्रोत्पादनं रात्रिन्दिवं वर्धते। तत्र कस्यचिद् वस्तुनः अभावो न जायते। निरन्तरमुत्पादनस्य वृद्धिः राष्ट्रस्यार्थिक स्थितिं सुदृढीकृत्य अप्रतिहतविकासाय प्रेरणां ददाति।। |

शब्दार्थ-
निष्ठां = विश्वास, आदर।
दधानाः = धारण करने वाले।
प्रभवन्ति = समर्थ होते हैं।
रात्रिन्दिवम् = रात और दिन।
कस्यचिद् = किसी की।
जायते = होता है।
सुदृढीकृत्य = भली प्रकार दृढ़ (मजबूत) करके।
अप्रतिहतविकासाय = न रुकने वाले (निरन्तर) विकास के लिए।

प्रसंग
प्रस्तुत पद्यांश में श्रम की महत्ता को बताया गया है।

अनुवाद
जिस राष्ट्र में श्रम में निष्ठा रखने वाले लोग जीविका उपार्जन के अनुकूल अवसर पाते हैं, कुटुम्ब की उन्नति के लिए समर्थ होते हैं, वहाँ उत्पादन रात-दिन बढ़ता है। वहाँ किसी वस्तु का अभाव नहीं होता है। निरन्तर उत्पादन की वृद्धि राष्ट्र की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करके बिना रुके विकास की प्रेरणा देती है।

(8) अद्यत्वे सर्वत्रापि नैकप्रकाराणां पदार्थानामुत्पादनं कर्तुं बढ्यः उद्योगशालाः कार्यशालाश्च स्थापिताः सन्ति यत्र सहस्रशः श्रमिकाः कार्य कुर्वन्ति। द्विविधास्तावदिमा उद्योगशालाः। सर्वकारीयक्षेत्रे संस्थापिता वैयक्तिकक्षेत्रे च कृताः। तत्र सर्वकारीयाणाम् उद्योगशालानां मुख्य लक्ष्यं तु अन्यान्योद्योगानामाधारभूतपदार्थानां यथा लौहादिधातून, गुरुणां यन्त्राणां, विविधानां रसायनानामुत्पादनं न तु लाभार्जनम्। किन्तु वैयक्तिक्य उद्योगशालास्तु लाभार्जनोद्देश्येनैव प्रायशः स्थाप्यन्ते। धनिकाः स्वधनं नियोजयन्ति, धनहीनाश्च स्वश्रमम्। प्रबन्धस्तु धनिकानां तेषां प्रतिनिधीनां वा हस्ते निहितोऽतस्ते अधिकाधिकं लाभांशं जिघृक्षवः श्रमिकेभ्योऽल्पमेव वितरन्ति। एवञ्च धननियोक्तृणां श्रमिकाणां च मध्येऽनेकशः कलहाः भवन्ति, लाभस्यासमानवितरणकारणात्। एवं विधानामन्यासां च, सम्बन्धिनीनां समस्यानां समाधानार्थं श्रमिकाणां कल्याणकृते चास्माकं राष्ट्रे प्रदेशेषु च श्रममन्त्रालयाः श्रमन्यायालयाश्च श्रमिकाणामधिकाराणां रक्षणार्थं विधिसंहिता निर्मिता वर्तते। यदि कश्चिच्छमिकः । कार्यरतो दुर्घटनाग्रस्तो जायते तर्हि क्षतिपूयँ नियमानुसारेण धनराशिर्देयो, भवति।

श्रमिकस्य भविष्यनिधावपि नियोक्त्रा अंशतो धनं देयं भवति। एवं सत्यपि अस्माकं देशे न तु श्रमिकाणामेव दशा तथा ऋद्धिमती वर्तते नापि उद्योगानामुत्पादनं तादृशं भवति यथा यादृशं च जापानामेरिकाब्रिटेनादि विकसितेषु देशेषु, वस्तुतः सत्स्वपि नियमेषु तेषां पूर्णतया पालनस्य वाञ्चैव यावन्नं भवति शुचिमनसा च श्रमेणोत्पादनं न क्रियते तावदुभयमपि कथं सिद्ध्येत्। यथा समन्वितं सैन्यं समन्वितेन प्रयासेन युद्धं जेतुं शक्नोति तथैव प्रबन्धकानां श्रमिकाणां च मध्ये विश्वासानुसरः समन्वय एवं उत्पादनलक्ष्य प्राप्तुं प्रभवति। सारांशोऽयं यत् अमो नाम जयति परं परस्परं सहयोगेन तु सत्वरं सुतरां च विजयते।।

शब्दार्थ-
अद्यत्वे = आजकल।
नैकप्रकाराणाम् = अनेक प्रकारों का।
बढ्यः = बहुत-सी।
द्विविधाः = दो प्रकार की।
सर्वकारीयक्षेत्रे = सरकारी क्षेत्र में।
वैयक्तिकक्षेत्रे = व्यक्तिगत क्षेत्र में।
गुरुणां यन्त्राणां = भारी मशीनों का।
लाभार्जनम् = लाभ कमाना।
नियोजयन्ति = लगाते हैं।
निहितोऽतस्ते (निहितः + अतः + ते) = रखा रहता है, इसलिए वे।
जिघृक्षवः = लेने की (हड़पने) इच्छा करने वाले।
धननियोक्तृणाम् = धन लगाने वालों।
समाधानार्थम् = समाधान के लिए।
विविधसंहिता = तरह-तरह के कानून।
नियोक्त्रा = नियुक्ति देने वाले के द्वारा।
ऋद्धिमती = धन-धान्य वाली।
तादृशं = वैसा।
यादृशं = जैसा।
संत्स्वपि = (सत्सु + अपि) = होने पर भी।
वाञ्छैव = इच्छा ही। यावत् = जब तक।
शुचिमनसा = पवित्र मन से।
समन्वितम् = मिला-जुला।
समन्वयः = एकता।
प्रभवति = समर्थ होता है।
सत्वरम् = शीघ्र। सुतरां = अच्छी तरह।
विजयते = विजय होती है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में उद्योगशाला में कार्यरत श्रमिकों की दशा को सुधारने के उपाय बताये गये हैं।

अनुवाद
आजकल सभी जगह अनेक प्रकार के पदार्थों का उत्पादन करने के लिए बहुत-सी उद्योगशालाएँ एवं कारखाने स्थापित हैं, जहाँ हजारों मजदूर कार्य करते हैं। ये उद्योगशालाएँ दो प्रकार की हैं–सरकारी क्षेत्र में स्थापित और निजी क्षेत्र में बनायी गयी। उनमें सरकारी उद्योगों का मुख्य उद्देश्य (लक्ष्य) तो अन्य दूसरे उद्योगों के आधारभूत पदार्थों; जैसे-लोहा आदि धातुओं का, भारी मशीनों का, अनेक प्रकार के रसायनों का उत्पादन करना है, लाभ कमाना नहीं; किन्तु निजी उद्योग तो प्रायः लाभ कमाने के उद्देश्य से ही स्थापित किये जाते हैं। धनी लोग अपनी पूँजी को और निर्धन अपने श्रम को लगाते हैं। प्रबन्ध तो धनिकों या उनके प्रतिनिधियों के हाथ में रहता है; अतः वे अधिक-से-अधिक लाभांश लेने (हड़पने) के इच्छुक होते हैं, श्रमिकों को थोड़ी मजदूरी ही बाँटते हैं।

इस प्रकार पूँजी लगाने वाले और मजदूरों के बीच लाभ के असमान वितरण के कारण अनेक प्रकार के झगड़े होते हैं। इस प्रकार की और दूसरे प्रकार की श्रम सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए, श्रमिकों की भलाई के लिए हमारे राष्ट्र में और प्रदेशों में श्रम मन्त्रालय और श्रम न्यायालय हैं। मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक कानून बने हुए हैं। यदि कोई मजदूर काम करते हुए दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है तो क्षतिपूर्ति के लिए नियम के अनुसार धनराशि देय होती है। मजदूर की भविष्यनिधि में भी नियोक्ता को आंशिक धन देना होता है। ऐसा होने पर भी हमारे देश में श्रमकिों की दशा उतनी धन-धान्युपूर्ण नहीं है और न ही उद्योगों का उत्पादन वैसा होता है, जैसा कि जापान, ब्रिटेन, अमेरिका

आदि विकसित देशों में। वास्तव में नियमों के होते हुए भी उनके पूर्णरूप से पालन की इच्छा ही जब तक नहीं होती है और पवित्र मन से परिश्रम से उत्पादन नहीं किया जाता है, तब तक दोनों ही बातें कैसे सिद्ध हो सकती हैं; अर्थात् नहीं हो सकती हैं। जिस प्रकार संगठित सेना एकजुट होकर युद्ध को जीत सकती है, उसी प्रकार प्रबन्धकों और श्रमिकों के बीच विश्वास के अनुसार सहयोग ही उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। सारांश यह है कि श्रम की जीत होती है, परन्तु आपस में सहयोग से शीघ्र और अच्छी तरह जीत होती है।

लय उत्तरीय प्ररन 

प्ररन 1
श्रम की परिभाषा लिखकर उसका जीवन में महत्त्व बताइए। |
उत्तर
किसी उद्देश्य से युक्त कर्म के लिए किये जाने वाले प्रयत्न को श्रम कहा जाता है। श्रम मनुष्य के जीवन में भौतिक क्षमता के साथ-साथ आत्मशक्ति का उत्कर्ष भी करता है। परिश्रमी मनुष्य

करो या मरो’ की भावना को प्रभावित करता है। इसीलिए श्रम-परायण मनुष्य को अपना लक्ष्य अधिक-से-अधिक समीप आता हुआ प्रतीत होता है।

प्ररन 2
श्रम को सन्मित्र क्यों कहा गया है?
उत्तर-
एक सन्मित्र (अच्छा मित्र) आपत्ति में पड़े हुए अपने मित्र के प्रति सहानुभूति प्रकट करता है, उसके कष्टों को दूर कर उसका हितसाधन करता है और उसके अच्छे जीवन की कामना करता है। इसी प्रकार श्रम भी मनुष्य के मनोबल को बढ़ाकर उसको कल्याण करता है। इसीलिए श्रम को सन्मित्र कहा गया है।

प्ररन 3
श्रम से होने वाले लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
परिश्रमी मनुष्य के लिए श्रम तो आवश्यक है ही, किन्तु श्रमशील मनुष्य द्वारा किये गये श्रम से दूसरों का भी भला होता है; उदाहरणार्थ-किसान अपने श्रम से उत्पन्न किये गये अन्न से अपने साथ-साथ दूसरों का भी पोषण करता है तथा श्रमिक द्वारा किसी उद्योगशाला में उत्पादित अनेकानेक वस्तुओं से जहाँ उसको स्वयं लाभ होता है, वहीं दूसरे लोगों को भी लाभ पहुँचता है। संस्कृत में एक उक्ति है कि, ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः’, अर्थात् श्रमशील मनुष्यों को ही लक्ष्मी प्राप्त होती है।

प्ररन 4
इन्द्र ने हरिश्चन्द्र के पुत्र को क्या उपदेश दिया?
उत्तर
इन्द्र ने हरिश्चन्द्र के पुत्र को बताया कि सुख एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए परिश्रम की आवश्यकता होती है; क्योंकि निरन्तर चलता हुआ प्राणी मीठा फल प्राप्त करता है। निरन्तर चलता हुआ प्राणी ही स्वादिष्ट गूलर के फल को चखता है। सूर्य का प्रकाश भी निरन्तर चलता हुआ कभी आलस्य नहीं करता।

प्ररन 5
हमारे देश में कितने प्रकार के कारखाने हैं और उनका क्या उद्देश्य है?
उत्तर
हमारे देश में दो प्रकार के कारखाने हैं–
(1) सरकारी क्षेत्र में स्थापित और
(2) व्यक्तिगत क्षेत्र में स्थापित। सरकारी क्षेत्र में स्थापित कारखानों का उद्देश्य लाभ अर्जित करना नहीं होता। इनका उद्देश्य दूसरे उद्योगों के लिए आधारभूत पदार्थों; जैसे-लोहा, भारी मशीनों, विभिन्न रसायनों आदि; का उत्पादन करना होता है। व्यक्तिगत क्षेत्र में प्रायः लाभ कमाने के उद्देश्य से ही कारखाने स्थापित किये जाते हैं।

प्ररन 6
श्रमिकों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा किये गये कार्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
श्रमिकों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा निम्नलिखित कार्य किये गये हैं

  1. श्रमिकों की धन सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए राष्ट्र और प्रदेशों में श्रम मन्त्रालय’ और ‘श्रम न्यायालय स्थापित किये गये हैं। |
  2. श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक कानून बनाये गये हैं।
  3. श्रमिकों के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में नियोक्ता द्वारा उसे नियमानुसार धनराशि देनी होती है।
  4. श्रमिकों के लिए भविष्य-निधि का भी प्रावधान किया गया है, जिसमें नियोक्ता को भी श्रमिक के बराबर का अंशदान करना पड़ता है।

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