up board class 9th hindi | नागार्जुन

By | May 12, 2021

up board class 9th hindi | नागार्जुन

 
                                   जीवन-परिचय एवं कृतियाँ
 
प्रश्न कवि नागार्जुन का जीवन-परिचय देते हुए इनकी काव्य-कृतियों (रचनाओं) पर प्रकाश
डालिए।
उत्तर― जनकवि नागार्जुन दलित वर्ग के पक्षधर कवि थे। अपने काव्य के द्वारा इन्होंने दलित वर्ग में
इतनी चेतना भरने का प्रयास किया कि वह अन्याय का विरोध कर सके। व्यवस्था के विरोध में व्यंग्य करने
से ये कभी नहीं चूकते थे।
जीवन-परिचय―श्री नागार्जुन का जन्म बिहार प्रान्त के दरभंगा जिले के सतलखा (तरौनी) ग्राम में
सन् 1911 ई० में हुआ था। इनका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र है। पहले ये ‘यात्री’ उपनाम से लिखा करते
थे। बाद में इन्होंने बुद्ध के प्रसिद्ध शिष्य के नाम पर अपना नाम नागार्जुन रख लिया और इसी नाम से प्रसिद्ध
हुए। इनका आरम्भिक जीवन पर्याप्त अभावों में बीता। जीवन के अभावों ने ही आगे चलकर इनके संघर्षशील
व्यक्तित्व का निर्माण किया। नागार्जुन की प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई। काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय से व्याकरण का अध्ययन करने के बाद इन्होंने कलकत्ता से साहित्य शास्त्राचार्य तक
संस्कृत का अध्ययन किया। सन् 1933 ई० में विवाह किया और सन् 1934 ई० में गृहस्थ धर्म को त्यागकर
इधर-उधर घूमते हुए सन् 1936 ई० में श्रीलंका पहुँच गये और वहाँ संस्कृत भाषा के आचार्य हो गये। यहीं
पर आपने पालि भाषा और बौद्ध धर्म का विशेष अध्ययन किया। सन् 1941 ई० में भारत वापस लौटे और
पुन: गृहस्थ धर्म में प्रविष्ट हुए। इसके उपरान्त सामाजिक जीवन व्यतीत करते हुए निरन्तर साहित्य-साधना में
व्यस्त रहे। ये साम्यवादी पार्टी के सक्रिय सदस्य भी रहे तथा पार्टी सम्बन्धी राजनीतिक गतिविधियों के कारण
अनेक बार जेल यात्राएँ भी की। ‘बाबा’ की उपाधि से विभूषित यह क्रान्तिकारी कवि 87 वर्ष की आयु में
5 नवम्बर, 1998 ई० को दरभंगा के ही लहरियासराय में इस असार संसार से कूच कर गया।
कृतियाँ―नागार्जुन मानवतावादी कवि रहे हैं। इनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं-
उपन्यास―‘रतिनाथ की चाची’, ‘बलचनमा, ‘नयी पौध’, ‘बाबा बटेसरनाथ’, ‘दुःखमोचन’, ‘वरुण
के बेटे’, ‘कुम्भीपाक’ तथा ‘उग्रतारा’।
काव्य―‘युगधारा’, ‘सतरंगे पंखों वाली’, ‘प्यासी पथरायी आँखें’, ‘खून और शोले’, ‘हजार-हजार
बाहों वाली’, ‘तुमने कहा था’, ‘तालाब की मछलियाँ’, ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ आदि इनके प्रमुख
काव्य-संग्रह हैं। ‘भस्मांकुर’ इनका प्रसिद्ध खण्डकाव्य है। इन्होंने ‘दीपक’ (हिन्दी मासिक), ‘विश्वबन्धु’
(हिन्दी साप्ताहिक), पत्रिकाओं के सम्पादन के साथ-साथ महाप्राण निराला पर एक समीक्षात्मक निबन्ध भी
लिखा है। इनकी रचनाओं पर इन्हें उत्तर प्रदेश का भारत-भारती, मध्य प्रदेश का कबीर तथा बिहार का
राजेन्द्र प्रसाद सम्मान प्राप्त हुआ है।
साहित्य में स्थान―नागार्जुन जीवन के, धरती के, जनता के तथा श्रम के गीत गाने वाले ऐसे कवि थे
जिनकी रचनाओं को किसी वाद की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। प्रगतिवादी कवियों में इनका अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी निर्भीक स्पष्टवादिता और तीव्र गहन व्यंग्यात्मकता के कारण नागार्जुन हिन्दी
साहित्य में चिरस्मरणीय रहेगे।
 
                     पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या (पठनीय अंश सहित)
 
◆  बादल को घिरते देखा है
 
(1) अमल-धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है।
      छोटे-छोटे मोती जैसे, अतिशय शीतल वारि कणों को
      मानसरोवर के उन स्वर्णिम-कमलों पर गिरते देखा है।
      तुंग हिमाचल के कंधों पर छोटी बड़ी कई झीलों के
                              श्यामल शीतल अमल सलिल में
                               समतल  देशों   से   आ-आकर
                                पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त मधुर बिसतंतु खोजते, हंसों को तिरते देखा है।
अमल = निर्मल। धवल = सफेद। वारि = जल। स्वर्णिम कमल = सोने के रंग वाले पीले कमल । तुंग
ऊंँचा। सलिल = पानी। पावस = वर्षा ऋतु। ऊमस = गर्मी । आकुल = व्याकुल। तिक्त = कसैले।
बिसतंतु = कमल नाल के भीतर के कोमल रेशे।]
सन्दर्भ―प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित नयी काव्य-
धारा के समर्थ कवि नागार्जुन द्वारा रचित ‘बादल को घिरते देखा है’ शीर्षक कविता से अवतरित हैं। यह
काव्यांश नागार्जुन जी की काव्य-रचना ‘प्यासी पथरायी आँखें’ से लिया गया है।
[विशेष—इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी पद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।].
प्रसंग―इन पंक्तियों में कवि ने हिमालय के वर्षाकालीन सौन्दर्य का सुन्दर चित्रण किया है।
व्याख्या―कवि कहता है कि मैंने निर्मल और चाँदी के समान श्वेत बर्फ से आच्छादित हिमालय की
ऊँची चोटियों पर घुमड़ते हुए बादलों के मनोरम दृश्य को देखा है। मैंने वहाँ मानसरोवर झील में खिले
सुनहले कमलों पर मोती के समान झिलमिलाती शीतल वर्षा की बूंदों को गिरते हुए भी देखा है। वास्तव में
यह बहुत मोहक दृश्य है।
कवि हिमालय की प्राकृतिक सुषमा के विषय में कहता है कि उस पर्वतीय प्रदेश में हिमालय के
ऊँचे-ऊँचे शिखररूपी कन्धों पर अनेक छोटी-बड़ी झीलें स्थित हैं। इनका गहरा नीला-नीला-सा निर्मल जल
बहुत ही शीतल है। मैदानी प्रदेश की वर्षाकालीन उमस से व्याकुल होकर हंस इन झीलों में आ जाते हैं। वे
कसैले और मीठे कमलनाल के कोमल रेशों को खोजते हुए इन झीलों के शीतल जल में तैरते हुए बहुत सुन्दर
लगते हैं। यह दृश्य मैंने अपनी आँखों से देखा है।
काव्यगत सौन्दर्य―(1) हिमालय की सुन्दरता का मोहक दृश्य प्रस्तुत करके कवि ने अपनी कुशल
प्रकृति-चित्रण-कला का परिचय दिया है। (2) भाषा―तत्सम शब्दावली प्रधान सरल खड़ी बोली।
(3) शैली―लयात्मकतायुक्त प्रवाहपूर्ण। (4) रस―शृंगार। (5) शब्द-शक्ति―व्यंजना। (6) गुण―
माधुर्य। (7) अलंकार―‘अमल धवल …… घिरते देखा है’, ‘श्यामल शीतल अमल सलिल में’ में
अनुप्रास, छोटे-छोटे’, ‘आ-आकर’ में पुनरुक्तिप्रकाश, ‘छोटे-छोटे मोती जैसे’ में उपमा तथा स्वर्णिम-
कमलों’ में रूपक अलंकारों का मंजुल प्रयोग काव्य की श्रीवृद्धि करने में सफल हुआ है। (8) भाव-
साम्य―वर्षा का कुछ ऐसा ही सुन्दर वर्णन सुमित्रानन्दन पन्त ने भी किया है―
                                       वर्षों के प्रिय स्वर उर से बुनते सम्मोहन,
                                       प्रणयातुर शत कीट-विहग करते सुख-गायन!
                                       मेघों का कोमल तम श्यामल तरुओं से छन !
                                       मन में भू की अलस लालसा भरता गोपन !
 
(2)  एक-दूसरे   से   वियुक्त  हो
      अलग-अलग रहकर ही जिनको
      सारी     रात    बितानी    होती
      निशा-काल के चिर अभिशापित
      बेबस उन चकवा-चकई का,
      बन्द हुआ क्रन्दन फिर उनमें
      उस महान् सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर, प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
वियुक्त = पृथक्। निशा-काल = रात का समय। चिर = बहुत समय से । अभिशापित = मिला हुआ
शाप। बेबस = विवश। क्रन्दन = करुण विलाप। सरवर = सरोवर। तीरे = किनारे। शैवाल = काई,
सिवार। प्रणय-कलह = प्रेम की लड़ाई।]
प्रसंग―इन पंक्तियों में कवि ने हिमालय पर स्थित सरोवर के किनारे रहने वाले चकवा-चकवी के
वियोग और मिलन के माध्यम से समय के प्रभाव अर्थात् सुख-दुःख के शाश्वत क्रम को दर्शाया है।
व्याख्या―कवि कहता है कि चकवा-चकवी आपस में एक-दूसरे से अलग रहकर सारी रात बिता
देते हैं। किसी पूर्वकालीन शाप के कारण वे रात्रि में मिल नहीं पाते हैं; अत: विरह में व्याकुल होकर वे करुण
विलाप करने लगते हैं। प्रात:काल में पुनर्मिलन होने पर उनका क्रन्दन बन्द हो जाता है और वे मानसरोवर की
काईरूपी हरी दरी के ऊपर प्रेम-क्रीड़ा करने लगते हैं। इस प्रेम-क्रीड़ा में कभी-कभी वे झगड़ते भी हैं। उस
महान् मानसरोवर के तट पर खड़े होकर मैंने उस रम्य प्रेम की लड़ाई को देखा है। रात्रि में वे दोनों जहाँ
वियोग के कारण क्रन्दन कर रहे थे वहीं प्रात: होने पर प्रेम से किल्लोल कर रहे हैं। तात्पर्य यह है कि जीवन
में सुख-दुःख तो आते रहते हैं, इनसे कभी घबराना नहीं चाहिए।
काव्यगत-सौन्दर्य―(1) यहाँ चकवा-चकवी मानवीय सुख-दुःख के प्रतीक हैं। जीवन के यथार्थ
को प्रतीकात्मकता प्रदान कर काव्य-गुण की वृद्धि की गयी है। (2) भाषा―तत्सम शब्दावली प्रधान सहज
सरल खड़ी बोली। (3) शैली―प्रतीकात्मक और प्रवाहपूर्ण। (4) रस―शृंगार एवं शान्त। (5) गुण―माधुर्य
एवं प्रसाद। (6) अलंकार―पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास एवं रूपका (7) छन्द―तुकान्त-मुक्त।
 
(3)                             कहाँ गया धनपति कुबेर वह,
                                  कहाँ गयी उसकी वह अलका?
                                  नहीं   ठिकाना   कालिदास के,
                                  व्योम-वाहिनी गंगाजल  का।
ढूँढा बहुत परन्तु लगा क्या, मेघदूत का पता कहीं पर!
कौन बताये वह यायावर, बरस पड़ा होगा न यहीं पर।
                                जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में, नभचुम्बी कैलाश शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से, गरज-गरज भिड़ते देखा है।
धनपति कुबेर = अपार धन का स्वामी कुबेर।अलका = कुबेर की नगरी। व्योम-वाहिनी = आकाश में
बहने वाली। मेघदूत = कालिदास की एक रचना, मेघरूपी दूत। यायावर = घुमन्तू व्यक्ति। नभचुम्बी =
आकाश को चूमने वाली। शीर्ष = शिखर। झंझानिल (झंझा + अनिल) = तूफानी हवा।]
प्रसंग―प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने यह बताया है कि सुख-दुःख, वैभव-विपन्नता जीवन में
निरन्तर आने-जाने वाली परिस्थितियाँ हैं। जीव इनके समक्ष असमर्थ और विवश है।
व्याख्या―कविवर नागार्जुन कहते हैं कि कालिदास के ‘मेघदूत’ में वर्णित वह धनाढ्य कुबेर कहाँ
गया, जिसके अभिशाप से यक्ष अपनी प्रिया से अलग हो गया था। समस्त वैभव और विलास के साधनों से
युक्त कुबेर की वह अलका नामक नगरी भी दिखाई नहीं पड़ती। कालिदास द्वारा वर्णित आकाश-मार्ग से
जाती हुई उस पवित्र गंगा का जल कहाँ चला गया ? कवि का भाव यह है कि इस परिवर्तनशील जगत् में कुछ
भी स्थिर नहीं है। कवि पुनः कहता है कि बहुत ढूंढ़ने पर भी मुझे मेघरूपी उस दूत के दर्शन नहीं हो सके।
ऐसा भी हो सकता है कि इधर-उधर घूमते रहने वाला वह मेघ यक्ष का सन्देश ही न पहुंचा पाया हो और
लज्जित होकर पर्वत पर यहीं कहीं बरस पड़ा हो, इस बात को बताने वाला भी कोई नहीं है। छोड़ो, रहने दो,
यह तो कवि कालिदास की कल्पना थी। मैंने तो गगनचुम्बी कैलाश पर्वत के शिखर पर भयंकर शीत में
विशाल आकार वाले बादलों को तूफानी हवाओं से गरज-बरसकर संघर्ष करते हुए देखा है। तात्पर्य यह है
कि यद्यपि हवा बादल को उड़ा ले जाती है और बादल वायू की तुलना में शक्तिहीन भी है; फिर भी हवा के
प्रति उसका संघर्ष अपने अस्तित्व को कायम रखने की चेष्टा है।
काव्यगत सौन्दर्य―(1) कवि ने इस तथ्य का उद्घाटन किया है कि संसार परिवर्तनशील है।
धन-वैभव कुछ भी स्थिर नहीं रहता। (2) बादल और झंझावात के संघर्ष से स्पष्ट है कि अस्तित्व की रक्षा के
लिए असमर्थ भी समर्थ से संघर्षरत हो सकता है। (3) भाषा―तत्सम शब्दावली प्रधान सरल-सहज खड़ी
बोली। (4) शैली―प्रतीकात्मक और प्रवाहपूर्ण! (5) रस―शान्त। (6) गुण―प्रसाद। (7) छन्द―
तुकान्त-मुक्त। (8) शब्द-शक्ति―लक्षणा एवं व्यंजना। (9) अलंकार―अनुप्रास एवं पुनरुक्तिप्रकाश।
 
(4)  दुर्गम       बर्फानी   घाटी     में,
       शत सहस्र फुट उच्च शिखर पर
       अलख   नाभि   से उठने   वाले
       अपने   ही   उन्मादक  परिमल
       के   ऊपर  धावित    हो-होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है।
दुर्गम = जहाँ जाना कठिन हो। बर्फानी = बर्फ से भरी। शतसहस्र = सैकड़ों और हजारों। अलख =
अलक्ष्य, दिखाई न पड़ने वाला। उन्मादक = मदहोश कर देने वाले। परिमल = सुगन्ध। धावित =
दौड़कर। तरल = चंचल। तरुण = युवा।]
प्रसंग―प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने व्यक्ति की विवशताओं को रेखांकित किया है।
व्याख्या―कविवर नागार्जुन का कहना है कि हजारों फुट ऊँचे पर्वत-शिखर पर स्थित बर्फानी
घाटियों में जहाँ पहुँचना ही बहुत कठिन होता है, वहाँ कस्तूरी मृग अपनी नाभि में स्थित अदृश्य कस्तूरी की
मनमोहक सुगन्ध से उन्मत्त होकर इधर-उधर दौड़ता रहता है। निरन्तर भाग-दौड़
करने पर भी जब वह
चंचल और युवा मृग उस कस्तूरी को प्राप्त नहीं कर पाता तो वह अपने-आप पर झुंझलाता है। मैंने उसकी
झुंँझलाहट और चिढ़ को सदेह वहाँ उपस्थित होकर अनुभव किया है।
काव्यगत सौन्दर्य―(1) कस्तूरी मृग के उदाहरण से कवि ने यहाँ यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य
अपनी ही सामर्थ्य को नहीं पहचान पाता तथा असफल होकर दुःखी होता है। (2) भाषा―तत्समप्रधान खड़ी
बोली। (3) शैली―प्रतीकात्मक और प्रवाहपूर्ण। (4) रस―शान्त। (5) छन्द―तुकान्त-मुक्त। (6) शब्द-
शक्ति―लक्षणा एवं व्यजना। (7) गुण―माधुर्य। (8) अलंकार―पद्य में सर्वत्र अनुप्रास और ‘हो-होकर’
में पुनरुक्तिप्रकाश।
 
(5)                     शत-शत निर्झर निर्झरिणी-कल
                          मुखरित   देवदारु  कानन    में
शोणित धवल भोजपत्रों से छाई हुई कुटी के भीतर
रंग-बिरंगे और सुगन्धित फूलों से कुन्तल को साजे
इन्द्रनील की माला डाले शंख सरीखें सुघर गले में,
कानों में कुवलय लटकाये,शतदल रक्त कमल वेणी में,
                        रजत-रचित मणि खचित कलामय
                        पान-पात्र       द्राक्षासव       पूरित
                        रखे      सामने         अपने-अपने
                         लोहित   चन्दन    की  त्रिपदी पर
                         नरम    निदाग  बाल       कस्तूरी-
                         मृग     छालों     पर   पल्थी मारे
                         मदिरारुण     आँखों   वाले   उन
                         उन्मद   किन्नर    किन्नरियों   की
मृदुल मनोरम अंगुलियों को वंशी पर फिरते देखा है।
[निर्झर = झरना। निर्झरिणी = छोटा झरना। कल = सुन्दर। मुखरित = गुंजित  देवदारु कानन = देवदार
के वन। शोणित धवल = लाल और सफेद। कुन्तल = केश। इन्द्रनील = नीलम नामक रत्न। सरीखे = के
समान। सुघर = सुन्दर। कुवलय = नीलकमल   शतदल रक्तकमल = सौ पंखुड़ियों वाला कमल   वेणी
= चोटी। रजत-रचित = चाँदी से बने हुए। मणिखचित = मणियों से जड़े हुए। पान-पात्र = मदिरा पीने
का बर्तन। द्राक्षासव = अंगूर की शराब। पूरित = पूरा भरा हुआ। लोहित = लाल रंग की। त्रिपदी = तिपाई।
निदाग = बिना दाग का। मदिरारुण = मद्यपान के कारण लाल। उन्मद = नशीले। मृदुल = कोमल।]
प्रसंग―इन पंक्तियों में कवि ने किन्नर-किन्नरियों पर पड़ने वाले बादलों के मादक प्रभाव का वर्णन
करते हुए आज के सम्पन्न वर्ग की विलासिता पर व्यंग्य किया है।
व्याख्या―कविवर नागार्जुन का कहना है कि आकाश में बादलों के छा जाने से उस किन्नर प्रदेश
की शोभा अपूर्व हो जाती है। उस समय सैकड़ों छोटे-बड़े झरने अपनी कल-कल ध्वनि से देवदारु के वनों
को गुंजित कर देते हैं। तात्पर्य यह है कि गिरते हुए झरने का स्वर देवदारु के जंगलों में गूंँजता रहता है। इन
देवदारु के वनों में लाल और श्वेत भोज-पत्रों से छायी हुई कुटी के अन्दर किन्नर और किन्नरियों के जोड़े
विलासमय क्रीड़ा में मग्न हो जाते हैं । वे (किन्नरों के जोड़े) अनेक प्रकार के रंगों वाले सुगन्धित फूलों से
अपने बालों को सजाये रखते हैं। वे अपने शंख के समान सुन्दर और सुडौल गले में इन्द्रनीलमणि की बनी
माला डाले रखते हैं। उनके कानों में नीलकमलों के कर्णफूल सुशोभित रहते हैं। उनकी चोटियों में सौ
पंखुड़ियों वाले लाल कमल के फूल गुंँथे रहते हैं।
किन्नर-किनरियों में मदिरापान करने के पात्र चाँदी के बने हुए होते हैं तथा उनमें कलात्मक ढंग से
मणियाँ जड़ी रहती हैं। वे मदिरापान के पात्रों को अंगूरों से बनी शराब से भरकर अपने-अपने सामने लाल
चन्दन से बनी तिपाई पर रख लेते हैं। वे कोमल, दागरहित, स्वच्छ बालों वाली कस्तूरी मृग की छाला
को बिछाकर पालथी मारकर बैठ जाते हैं। तत्पश्चात् वे मदिरापान करते हैं। मदिरापान के कारण उनकी आँखें
लाल हो जाती हैं और उन पर एक विचित्र प्रकार का नशा छाया रहता है। इसके बाद मदिरा से मदमस्त होकर
वे अपनी कोमल और सुन्दर अँगुलियों को बाँसुरी पर फिराते हुए मधुर संगीत की तान छेड़ देते हैं। बादलों
के घिरने पर किन्नर-किन्नरियों की इन विलासमयी क्रीड़ाओं को मैंने प्रत्यक्ष देखा है।
काव्यगत सौन्दर्य―(1) कवि ने किन्नर-किन्नरियों की विलासमयी क्रीड़ाओं के माध्यम से अमीरों
की विलासिता का यथार्थ चित्र अंकित किया है। (2) भाषा―संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली।
(3) शैली―वर्णनात्मक और विचारात्मक। (4) रस―शृंगार। (5) छन्द―तुकान्त-मुक्त। (6)
गुण―माधुर्य। (7) शब्द-शक्ति―लक्षणा और व्यंजना। (8) अलंकार―‘शंख सरीखे सुघर गले में
उपमा, ‘शत-शत’, ‘अपने- अपने’ में पुनरुक्तिप्रकाश तथा सम्पूर्ण पद्य अनुप्रास की मनोरम छटा
देखते ही बनती है।
 
                     काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध सम्बन्धी पश्न
 
प्रश्न 1 निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों के नाम लिखिए तथा उनका स्पष्टीकरण भी
दीजिए―
(क) छोटे-छोटे मोती जैसे, अतिशय शीतल वारि कणों को―
      मानसरोवर के उन स्वर्णिम-कमलों पर गिरते देखा है।
(ख) शोणित-धवल भोजपत्रों से छाई हुई कुटी के भीतर
       रंग-बिरंगे और सुगन्धित फूलों से कुन्तल को साजे।
       इन्द्रनील की माला डाले शंख सरीखे सुघर गले में
उत्तर―(क) छोटे-छोटे में पुनरुक्ति प्रकाश, छोटे-छोटे मोती जैसे में उपमा, स्वर्णिम-कमलों में
रूपक तथा अनुप्रास का मोहक प्रयोग।
(ख) शंख सरीखे सुघर गले में उपमा तथा अनुप्रास का मोहक प्रयोग।
 
प्रश्न 2 निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त रसों को पहचानकर उनके स्थायी भाव लिखिए―
(क) शैवालों की हरी दरी पर, प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
(ख) नरम निदाग बाल कस्तूरी―
       मृगछालों पर पल्थी मारे
       मदिरारुण आँखों वाले उन
       उन्मद किन्नर किन्नरियों की
      मृदुल मनोरम अंगुलियों को वंशी पर फिरते देखा है।
उत्तर― (क) रस-शृंगार, स्थायी भाव-रति।
           (ख) रस-शृंगार, स्थायी भाव-रति।
 
प्रश्न 3 निम्नलिखित शब्दों में सविग्रह समास-नाम लिखिए―
          प्रणय-कलह, धनपति, महामेघ, शतदल, त्रिपदी।
उत्तर― शब्द                 समास-विग्रह                 समास-नाम
           प्रणय-कलह        प्रणय की क्रीड़ा                षष्ठी तत्पुरुष
            धनपति           धन का पति अर्थात् स्वामी     षष्ठी तत्पुरुष
            महामेघ                        महान मेघ              कर्मधारय
            शतदल              सौ पंखुड़ियों का समूह        द्विगु
             त्रिपदी                तीन पदों का समाहार         द्विगु
 
प्रश्न 4 निम्नलिखित पदों से उपसर्ग और प्रत्ययों को अलग-अलग करके मूल-शब्द
          लिखिए―
उत्तर―  शब्द          मूलशब्द         उपसर्ग       प्रत्यय
           उन्मुक्त        मुक्त              उत्              ―
           स्वर्णिम       स्वर्ण               ―              इम
           वियुक्त        युक्त                वि              ―
        अभिशापित    शाप              अभि            इत
           मुखरित      मुखर                ―             इत

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